UA-149348414-1 मैं और मेरे दोस्त

 मैं और मेरे दोस्त


आज महीनों बाद अपने एक बचपन के दोस्त से मिला। यूं तो अक्सर फोन पर  उससे बाते करता रहता हूँ , सच बोलूं तो दोस्तों में सबसे ज्यादा उसी से बात हो पाती है। लेकिन आज मिलकर ऐसा लगा कि तकनीकी भले ही इंसान के बीच की भौगोलिक दूरियां कम करने का  दावा करता हो लेकिन वो आत्मीय मिलन की जगह की भरपाई कभी नही कर पायेगा। हमने सिर्फ चाय पीया, कुछ किताबों के बारे में बात किया। जब भी मेरे किसी करीबी के मन के विचार में भटकाव दिखता है आदतन मैं उसकी रिपेयरिंग की जिम्मेदारी खुद ले लेता हूँ ,तो उसने जैसे ही समय के बारे में कुछ गलत दिशा में बात किया। मैंने मौके का पूरा फायदा उठाया और आइंस्टीन के "थ्योरी ऑफ रिलेटीविटी" के बेसिक्स समझाने का प्रयास किया। लगभग 5 मिनट इसपे पूरी रूचि के साथ बोलता रहा। रात भर सोया नहीं हूँ, 4 बजे तक पढाई की है फिर भी पूरी ऊर्जा के साथ बोला। लेकिन समय को हम कितना भी समझ ले समय किसी के लिए नहीं ठहरता, हमारे लिए भी नहीं ठहरा, सुबह हो गयी। वो घर जाने को तैयार हो गया। मैं उसे ऑटो तक बिठा के लौट आया, तब तक कुछ भी अजीब नहीं था। घर आकर बिस्तर पर लेटते ही दिमाग एक झटके से अतीत के गोते में चक्कर लगा कर आ गया। 2008 में पहली बार उससे मीला था , तब हम आठवीं में थे। हम स्कूल में साथ थे और कोचिंग में भी साथ थे। फिर हमारा एक दोस्तों का ग्रुप बन गया। हम कुल मुख्यत: 4 थे फिर बाद में 5 हुए फिर 6 और 3...4 अन्य को भी शामिल किया जा सकता है। लेकिन 4 से 5 और 5 से 6 बनने की एक अपनी अलग कहानी है। मै किसी का नाम यहां नहीं लिखना चाहता दुविधा में हूँ किसका नाम पहले लिखना शुरू करूं। वो जब ये पढ़ेंगे तो इन 6 में अपना नाम खोज लेंगे। वो समझ जाएं वही काफी है। याद कर पा रहा हूँ मैं जितना याद आता है कि हम खूब लड़ें हर मुद्दे पर लड़े, बात चीत तक कई बार हमने किसी न किसी से ,किसी न किसी वजह से ,कभी न कभी बंद की है । लेकिन हर बार फिर इकट्ठे हुए। हममे कई बातों को लेकर मतभेद हैं लेकिन वो मतभेद अक्सर छोटे पड़ जाते हैं। मुझे पक्का यकीन है कि मेरे लिए उन 5 में से कोई जान देने तो नहीं आएगा ,और मैं ऐसा कभी चाहता भी नहीं क्योंकि सबकी अपने परिवार की जिम्मेदारियां है जैसे मेरी हैं। लेकिन हम जीवन में कभी भी ये बिना झिझक कह सके की वो हमारे पक्का वाला दोस्त था यही काफी है। पुरा नोस्टाल्जिया जैसा लग रहा है, वो घर जा रहा था, मैं अपने सपने के वजह से  उसके साथ घर नहीं जा सकता। वो अपने सपने के वजह से जब घर जाऊँ मुझसे मिलने को नहीं रहता। जिम्मेदारियों और सपने ने सबको अलग थलग पटक के रख दिया है। लेकिन उम्मीद करता हूँ कि उन्हें भी ऐसा खालीपन कभी न कभी महसूस होता हो या कम से कम इसे पढ़कर महसूस हो जाये। ये ब्लॉग पर बस इसलिए लिख रहा हूँ ताकि जब चाहू इसे पढ़ा जा सके।


-Alamin Ansari AKA कशिश बागी ( ये नाम भी याद दिलाने को काफी है ) एक दिन यही नाम तुम सब के बच्चे GK में याद करेंगे।

0 Comments