UA-149348414-1 डरो

 डरो


डरो कि

मेहतर 

जिस टोकरी में उठाता है 

सड़ांध कूड़ा 

एक दिन 

दफ़ना देगा 

उसी टोकरी में 

सड़ी गली बास मारती 

पूंजीवादी व्यवस्था को 

जिसमें टोकरी भर भी स्थान नहीं है

उस मेहतर के लिए


डरो कि 

बंकिया डोम

जला देता है 

अनगिनत मूर्दे श्मशान पर 

एक दिन 

जला देगा 

तिजोरियों में मृतप्राय

सोने के सिक्कों और नोटो को 


डरो कि 

लोहार 

बनाता है

मजबूत लोहे का दरवाजा 

भवनों और राजमहलों के लिए 

एक दिन 

बनाने लगेगा लोहे की बंदूके और तलवारें


डरो कि

बुढ़ा किसान 

जोत देता है 

सैकड़ों एकड़ भूमि

सींचता है पसीने से और लहलहा उठती हैं फसलें

एक दिन 

जोत देगा

इन्हीं लहलहाती फसलों को 


डरो 

उन सभी कामगारों से 

जो तुमसे डरना छोड़ 

लड़ना शुरू कर देंगे 

तो क्या होगा?


🔹आशीष यादव 


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