UA-149348414-1 दुःख का अधिकार

 दुःख का अधिकार



मनुष्यों की पोशाकें उन्हें विभिन्न श्रेणियों में बांट देती है। प्रायः पोशाक ही समाज में मनुष्य का अधिकार और उसका दर्जा निश्चित करती है। वह हमारे लिए अनेक बन्द दरवाजे खोल देती है परन्तु कभी ऐसी भी परिस्थिति आ जाती है कि हम जरा नीचे झुककर समाज की अनुभूति को समझना चाहते हैं, उस समय वह पोशाक ही बन्धन और बड़प्पन बन जाती है। जैसे वायु की लहरें कटी हुई पतंग को सहसा भूमि पर नहीं गिर जाने देती उसी तरह खास परिस्थितियों में हमारी पोशाक हमें झुक सकने से रोके रहती है।
             बाजार में, फुटपाथ पर कुछ खरबूजे डलिया पर कुछ जमीन पर बिक्री के लिए रखे थे । खरबूजे के समीप एक अधेड़ उम्र की औरत  बैठी रो रही थी ।  खरबूजे बिक्री के लिए थे, परंतु उन्हें खरीदने के लिए कोई कैसे आगे बढ़ता । खरबूजे को बेचने वाली तो कपड़े से मुंह छिपाए सिर को घुटने पर रखे फफक फफक कर रो रही थी।
               पड़ोस की दुकानों के तख्तों पर बैठे या बाजार में खड़े लोग घृणा से उस स्त्री के संबंध में बात कर रहे थे । उस स्त्री का रोना देख कर मन में एक व्यथा सी उठी पर उसके रोने का कारण जानने का उपाय क्या था ।
फुटपाथ पर उसके समीप बैठ सकने में मेरी पोशाक ही व्यवधान बन खड़ी हो गई । एक आदमी ने घृणा से एक तरफ ठोकते हुए कहा , "क्या जमाना है । जवान लड़के को मरे पूरा दिन नहीं बीता और यह बेहया दुकान लगाकर बैठी है ।" दूसरे साहब अपनी दाढ़ी खुजाते हुए कह रहे थे, 'अरे जैसी नियत होती है अल्लाह भी वैसी ही बरकत देता है । सामने के फुटपाथ पर खड़े एक आदमी ने दिया सलाई की तीली से कान खुजाते हुए कहा, 'अरे इन लोगों का क्या है । यह कमीने लोग रोटी के टुकड़े पर जान देते हैं । इनके लिए बेटा-बेटी,खसम, लुगाई ,धर्म-ईमान सब रोटी का टुकड़ा है । परचून की दुकान पर बैठे लाल जी ने कहा, ' अरे भाई उनके लिए मरे जिए का कोई मतलब ना हो पर दूसरे के धर्म ईमान का तो ख्याल रखना चाहिए ।जवान बेटे के मरने पर 13 दिन का सूतक होता है और यहां सड़क पर बाजार में आकर खरबूजे बेचने बैठ गई है । हजार आदमी आते जाते हैं । कोई क्या जानता है कि इसके घर में सूतक है । कोई इसके खरबूजे खा ले ले तो उसका धर्म ईमान कैसे रहेगा? क्या अंधेर है।
पास पड़ोस की दुकानों से पूछने से पता लगा उसका 23 बरस का जवान लड़का था । घर में उसकी बहू और पोता पोती है । लड़का शहर के पास डेढ़ बीघा जमीन में कछियारी करके परिवार का निर्वाह करता था। खरबूजो की डलिया बाजार में पहुंचाकर कभी लड़का स्वयं सौदे के पास बैठ जाता कभी मां बैठ जाती।
      लड़का परसों सुबह मुंह-अंधेरे बेलों में से पके खरबूजे चुन रहा था।  गीली मेड़ की तरावट में विश्राम करते हुए एक सांप पर लड़के का पैर पड़ गया। सांप ने लड़के को डस लिया। 
      लड़के की बुढ़िया मां बावली होकर ओझा को बुला लाई झाड़ना फुकना हुआ। नाग देव की पूजा हुई । पूजा के लिए दान दक्षिणा चाहिए । घर में कुछ आटा और अनाज था, दान दक्षिणा में उठ गया। मां बहू और बच्चे भगवाना से लिपट लिपट कर रोए और भगवाना जो एक दफे चुप हुआ तो फिर ना बोला। सर्प के विष से उसका सब बदन काला पड़ गया था।
जिंदा आदमी नंगा भी रह सकता है । परंतु मुर्दे को नंगा कैसे विदा किया जाए। उसके लिए बाजार की दुकान से नया कपड़ा तो लाना ही होगा। चाहे उसके लिए मां के हाथों की छन्नी ककना ही क्यों न बिक जाए भगवाना परलोक चला गया घर में जो कुछ चूनी भूसी थी सोउसे विदा करने में चली गई बाप नहीं रहा तो क्या। लड़के सुबह उठते ही भूख से बिलबिलाने लगे। दादी ने उन्हें खाने के लिए खरबूजे दे दिए ,लेकिन बहू को क्या देती । बहू का बदन बुखार से तवे की तरह तप रहा था। अब बेटे के बिना बुढ़िया को दुवन्नी-चवन्नी भी कौन उधार देता। बुढ़िया रोते-रोते और आंखें पोछते-पोछते भगवाना के बटोरे हुए खरबूजे डलिया में समेटकर बाजार की ओर चली।और चारा भी क्या था?
  बुढ़िया खरबूजे बेचने का साहस करके आई थी, परंतु सिर पर चादर लपेटे हुए फफक-फफक कर रो रही थी।
कल जिसका बेटा चल बसा, आज बाजार में सौदा बेचने चली है, हाय रे पत्थर दिल।
उस पुत्र वियोगिनी के दुःख का अंदाजा लगाने के लिए पिछले साल अपने पड़ोस में पुत्र की मृत्यु से दुखी माता की बात सोचने लगा। वह संभ्रांत महिला पुत्र की मृत्यु के बाद अढ़ाई मास तक पलंग से उथ न सकी थी। उन्हें 15-15  मिनट बाद पुत्र वियोग से मूर्छा आ जाती थी और मूर्छा ना आने की अवस्था में आंखों से आंसू ना रुकते थे। दो-दो डॉक्टर हरदम सिरहाने बैठे रहते थे । हरदम सिर पर बर्फ रखी जाती थी। शहर भर के लोगों के मन उस पुत्र शॉप से द्रवित हो उठते थे।
      जब मन को सूझ का रास्ता नहीं मिलता तो बेचैनी से कदम तेज हो जाते हैं । उसी हालत में नाक ऊपर उठाए राह चलने से ठोकरें खाता मैं चला जा रहा था । सोच रहा था .......
शोक करने,गम मनाने के लिए भी सहूलियत चाहिए और... दुखी होने का भी एक अधिकार होता है ।
     
- यशपाल

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