UA-149348414-1 गांधी और अहिंसा

 गांधी और अहिंसा

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आज गांधी जयंती है। पूरा सोशल मीडिया गांधी जयंती की शुभकामनाओं और गालियों दोनों से भरा होगा। गांधी को गालियां देने वालों के लिए मेरा दावा है की वो गांधी को जानते ही नहीं है और गांधी जयंती की शुभकामना देने वालों में से भी अधिकांश का हाल यही है।
            अमूमन हम सब गांधी के जीवन परिचय से वाकिफ हैं, हो भी क्यों न आखिर 6वीं से लेकर 8वीं तक हर साल एक ही निबन्ध वार्षिक परीक्षा में आता ही था - महात्मा गांधी
            लेकिन गांधी के जन्म और मृत्यु से परे गांधी के साथ एक विवाद जुड़ा है। एक सभ्य इंसान की भाषा में बोला जाए तो विवाद का विषय है गांधी का अतिअहिंसावादी होना। अगर आप विवेकहीन आवेग की भाषा में बोले तो विवाद का विषय है गांधी की कायरता
            गांधी की इस तथाकथित कायरता को साबित करने के लिए सहारा लिया जाता है भगत सिंह का और सरेआम बोला जाता है कि - " गांधी वो बनते हैं जिनकी भगत सिंह बनने की औकात नहीं होती " ।
            यहां औकात का मतलब साहस से है।
            बिना इतिहास को पढ़े किसी व्यक्ति और इतिहास के सम्बंध में पूर्वाग्रह से ग्रसित हो जाना इंसान की पुरानी बीमारी है। गांधी की अहिंसा और सत्याग्रह की क्रांति न तो कायरता तक सीमित है और न ही भगत सिंह की वामपंथ की क्रांति किसी हिंसा , बम ,पिस्टल ,सेना और खून खराबे से समन्धित है।
            अगर भगत सिंह की विचारधारा मारधाड़ एक्शन वाली होती तो वो हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोशिएशन के सदस्य नहीं होते और न ही वो इसका नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोशिएशन करते।  उनके पार्टी के नाम में रिपब्लिक एशोशियन की जगह आर्मी या फौज जैसा कोई शब्द जुड़ा होता। जैसे की सुभाष चन्द्र बोस की विचारधारा थी की क्रांति केवल सशस्त्र जंग से जीती जा सकती है ,इसलिए उनकी पार्टी का नाम ही था - आजाद हिन्द फौज
            भगत सिंह के नाम  का उपयोग गांधी के खिलाफ उनके नाम के वर्चस्व को खत्म करने के लिए किया गया। ताकि गांधी नाम के साथ कॉंग्रेस के एकछत्र वर्चस्व को खत्म किया जा सके। लेकिन भगत सिंह के नाम का उपयोग बस उतना ही किया गया जितना की उनकी खुद की धर्म के अंधे पन,धर्म की राजनीति, धर्म के पाखण्ड पर आंच न पाए। भगत सिंह की नास्तिकता, ईश्वरिय सत्ता पे प्रश्न, सामाजिक एकता, धार्मिक एकता ,समानता, शांति और समान अधिकार की विचारधारा को उनके नाम को उपयोग करने वालों द्वारा आम जन से दूर रखा गया ताकि अपना उनका धंधा चलता रहे।
           मैं यहां बस  गांधी की अतिअहिंसावादी और कायरता वाले विवाद की ही बात करूँगा।


           यह विवाद गांधी के साथ कब जुड़ा?


4-5 फरवरी 1922 को हुए चौरी चौरा कांड से। गांधी उस समय देश भर में असहयोग आंदोलन का आह्वान कर चुके थे। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार जारी था। 2 फरवरी 1922 को रिटायर्ड सेना के जवान भगवान अहीर के नेतृत्व में खाने पिने के समान के बढ़ते दाम और मार्केट में खुलेआम बिक रहे शराब के विरोध में एक मार्च निकला गया जिसपे पुलिस ने लाठीचार्ज किया और कई प्रदर्शनकारियों को चौरी चौरा जेल में बन्द कर दिया गया। पुलिस के इस रवैये के विरोध में 4 फरवरी 1922 को 2000-2500 प्रदर्शनकारियों की एक भीड़ ने एक मार्च निकाला। फिर से पुलिस ने लाठीचार्ज किया और उनके नेता को पकड़ के जेल में डाल दिया । प्रदर्शनकारियों  ने पुलिस स्टेशन को घेर लिया और अपने नेता के छुड़ाए जाने की मांग करते रहे और साथ में सरकार विरोधी नारे लगाते रहे। पुलिस ने भीड़ को डराने के लिए हवाई फायर किया , जिसके जवाब में भीड़ उग्र होकर पुलिस स्टेशन पर पत्थर फेकने लगी। फिर पुलिस सब इन्स्पेक्टर ने ओपन फायर के आदेश दे दिए, जिनमे 3 प्रदर्शनकारी मारे गए और कई घायल हुए। उग्र भीड़ ने पुलिस स्टेशन में आग लागा दी जिनमे सारे पुलिस कर्मी जल कर मारे गए और जो बचकर बाहर निकले उन्हें भीड़ ने मार डाला। मरने वाले पुलिसकर्मियों की संख्या 22-23 थी। इसके बाद चौरी चौरा में मार्शल लॉ लागू किया गया और कई रेड किये गए जिनमे 223 लोगों को पकड़ा गया। गांधी ने इस खून खराबे के वीरोध में 5 दिनों का उपवास रखा। 12 फरवरी 1922 को गांधी के कहने पर कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। गांधी ने कहा - "भारतीय हिंसक और उग्र हैं अभी वो क्रांति के लिये तैयार नहीं। भारतीयों को अभी अहिंसा और सत्याग्रह सिखाएं जाने की जरूरत है।" उधर इस मुकदमे के ट्रायल में 172 लोगों को मौत की सजा सुनाई गयी जबकि 6 लोग पहले ही पुलिस कस्टडी में मर चुके थे। बाद में  20 अप्रैल 1923 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस सजा पर पुनः विचार किया और नए फैसले के अनुसार सिर्फ 19 लोगो को फांसी, 110 को आजीवन कारावास ( काल पानी ) और बाकियों को लम्बी अवधि तक सश्रम कारावास की सजा दी गयी। चौरी चौरा का पूरा चैप्टर यहां खत्म हो जाता है। यही से गांधी पर अतिअहिंसावादी , पक्षपाति और कायर होने का ठप्पा लग जाता है।


क्या यह आरोप सही है?


मैं कहूंगा नहीं , इन आरोपो में रत्ती भर भी सच्चाई नहीं है। हालांकि मैं गांधी के वैवाहिक जीवन , ब्रह्मचर्य , सेक्स , सन्तान,  गर्भनिरोध आदि विषयों पर पुरुषवादी हो जाना और  महिला विरोधी हो जाना एवम तमाम आंदोलनों के बावजूद भी समाज में जातिगत असमानता पर ब्राह्मणवाद पर पेरियार-अम्बेडकर-भगत सिंह की तरह सीधे प्रहार न करना, इन सब जगहों पर मैं गांधी के विचारों से असहमत हूँ। लेकिन गांधी कायर थे और उनका सत्याग्रह - अहिंसा गलत था इस बात को बिल्कुल काट करता हूँ।

क्या गांधी कायर थे ?.....नहीं

  • भारत के पहले सत्याग्रह चम्पारण के आंदोलन में महिलाओं के   ज्यादा मात्रा में शामिल न होने की वजह जब उनको ये पता लगा की महिलाओं के पास ऐसे कपड़े ही नहीं हैं जिन्हें वो पहन कर पुरुषों के बीच आ सके, तो वो गांधी ही थे जिन्होंने संकल्प लिया की  जब तक कपड़ों और भूख की समस्या हिदुस्तान से खत्म नहीं हो जाती,तब तक वो पेट भर भोजन नहीं करेंगे और अपने बदन को पूरा नहीं ढकेंगे। ( गांधी इससे पहले सूट बूट में रहते थे )

  • वो सिर्फ गांधी ही थे जो हिन्दू विरोधी दंगो में मुसलमानों के बीच और मुस्लिम विरोधी दंगो में हिंदुओं के बीच अकेले लाठी लेकर उन्हें समझाने चल देते थे, यजी जानते हुए की भीड़ उनपे आक्रोशित है। उनके साथी उनको भीड़ द्वारा मारे जाने की बात करते वो कहते मैं जाऊंगा , तुम्हे डर है तो मत आओ मेरे पीछे।

  • वो गांधी ही थे जिन्हें दांडी यात्रा के दैरान बोला गया की आप बूढ़े हैं ,आप उतनी लम्बी यात्रा नही कर सकते हैं। आप घोड़ा गाड़ी से चलिए , बाकी समर्थक पैदल आयेगे। लेकिन उन्होंने घोड़ा गाड़ी को इस्तेमाल करने से माना कर दिया।

  • वो अकेले गांधी ही थे जिनमें ये बोल देने का साहस था की वो हिंदुस्तान में मुसलमानों के साथ खड़े हैं और पाकिस्तान में हिन्दुओं के साथ। उनके साहस का ही अमिट छाप था की उनके उत्तराधिकारी नेहरू ने साहस के साथ कहा था की हिन्दुसातन में हिंन्दुओं की सरपरस्थि नहीं चलेगी। यहाँ बराबरी का हक है और बराबरी का दावा। ये देश जितना हिंदुओं का है उतना ही मुसलमानों का। गांधी अच्छी तरह जानते थे की उनके इन बेबाक बोल उनकी आलोचना को जन्म देगा क्योंकि हिंदुस्तान में उस समय आजादी के बाद बंटवारे के दंगो से मुस्लिम विरोधी और पाकिस्तान में हिन्दू विरोधी माहौल था। ऐसा बोलना उनको मुसलमानो और हिंदुओं दोनों के निशाने पे लाकर खड़े कर देना था।

क्या आप दंगो वाली जगह पर जहां यह आरोप हो की सब दंगो के पीछे आप ही वजह है। न आप मुसलमानों के साथ खड़े  होते न ये सब होता। हिंदुस्तान सिर्फ हिंदुओं का होता। वहीं मुस्लिम संगठनों द्वारा ठीक वैसा ही उल्टा आरोप की गांधी ने मुसलमानों को ठगा है। ये सब जानने के बावजूद भी गांधी दंगो के बीच जाते और समझाते। अहिंसा और शांति के सन्देश देने के लिए सभाये करते। बिना किसी सुरक्षा के बेखौफ जनता के बीच जाते। ऐसी ही एक सभा में 30 जनवरी 1948 को कायरता और साम्प्रदायिकता की गोली ने गांधी की  साँसे रोक दी। लेकिन गांधी और उनके विचारों को वो कभी नहीं रोक पाए।


अब आप बताइए गांधी कायर थे ?


नहीं, गांधी कायर नहीं थे। गांधी सिर्फ एक अहिंसावादी थे। गांधी का क्रांति और लड़ने का तरीका सिर्फ था -  सत्याग्रह और अहिंसा


अब सवाल यह है कि-

गांधी क्यों अहिंसा पर इतना जोर देते थे ?
गांधी ने  क्यों एक चौरी चौरा हिंसा की वजह से पूरा आंदोलन ही बन्द कर दिया?


जवाब एक लाइन का है । क्रांति की पाठशाला का सबसे मजबूत तर्क और समझ वाली लाइन यही है। इसी लाइन के आस पास कोई भी क्रांति शुरू और सफल होती है।

वो लाइन है -

" जब आप अपनी लड़ाई सत्ता के खिलाफ लड़ रहे हों तो हिंसा का एक भी रास्ता सत्ता को आपकी क्रांति और आपको कुचल डालने का मौका देती है"

इसे आप आसान भाषा में यूं समझिए। अगर आप अपनी सरकार से किसी भी मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। आप सड़को पर आंदोलन कर रहे हैं । आप उस आंदोलन को अहिंसा के रास्ते पे ले जाकर बड़े आंदोलन में बदल सकते हैं । आप आवाम को अपने आन्दोलन से जोड़कर अपने आन्दोलन को मजबूत कर सकते हैं। लेंकिन क्या होगा अगर आप पुलिस वालों को गोली मार दें, या मुख्यमंत्री को या फिर प्रधानमंत्री को? सरकार को आपके आंदोलन और आप को कुचलने का मौका मिला और आप फांसी के फंदे पर होंगे।
फिर क्या हुआ आपके आंदोलन का? आगे बढ़ा? नहिं सब खत्म हो गया। अब उस आन्दोलन को फिर से शुरू से किसी और को शुरू करना होगा।

भारतीय लड़ रहे थे 1857 से । एक यह एक सशस्त्र आंदोलन था। लेकिन कभी बड़े पैमाने पर सफलता मिली? नहीं मिली।  साल गुजर गये ऐसे सशस्त्र आंदोलन करते हुए। सशस्त्र आंदोलन छोटी मोटी ताकत से लड़ने के लिए कारगर था न की ब्रिटेन जैसी बड़ी ताकत के साथ जिसके पास मित्र राष्ट्रों का समर्थन हो। बड़ी सेना , बड़े संसाधन और  बड़े हथियार। भारतीय के पास कुछ भी नहीं।

इसलिए गांधी अहिंसा पर जोर देते थे, ताकि आंदोलन को सत्ता द्वारा दबाये जाने का मौका न मिले।। जब भगत सिंह यह कहते हैं की बम और पिस्टल कोई क्रांति नहीं ला सकते तो उनका कहने का यही मतलब था जो गांधी का था।    बस कहने का तरीका अलग था।

गांधी आंदोलन से लोगों को जोड़ने के लिए सत्याग्रह करते थे, अंग्रेजी चीजों का बहिष्कार कराते थे, स्वदेशी अपनाने पर जोर देते थे ताकि अंग्रेज़ो की आमदनी कम हो और वो हिंदुस्तान के आवाम की मांगों को सुने। नमक पर कर बढ़ाये जाने पर नमक कानून को अवैध मानकर भारतीयों को खुद नमक बना लेने की सिख देते थे। हर किसान आंदोलन और मजदूर आंदोलन में हिस्सा लेते थे। घूम घूम कर अपनी बातें लोगों के बीच रखते थे। ये लड़ाई का उनका तरीका था।
जबकि भगत सिंह आंदोलन से अवाम को जोड़ने के लिए पर्चे पर अंग्रेज़ो के काले कानून के बारे में, आंदोलन के बारे में और क्रांति के बारे में लिख कर लोगो के बीच बांटते थे। ताकि लोगों में क्रांति को लेकर जागरूकता बढ़ें। जब उनको लगा की उनकी बाते ज्यादा लोगों तक नहीं पँहुच पा रही है और न ही सरकार उनकी बातें सुन रही है। तो असेम्बली पर नकली बम फेके ताकि वो जेल जाए उनकी बाते अखबारो में छपे और आसानी से लोगों तक पहुंचे। वो फांसी पे चढ़े ताकि आवाम आंदोलन से जुड़ सके।
        
गांधी और भगत सिंह दोनों का मकसद एक ही था - क्रांति , क्रांति से लोगों को जोड़ना और आजादी।


बस तरीके और तेवर में फर्क था। वो फर्क मनोवैज्ञानिक वजह से है। भगत सिंह जब क्रांति में भाग लेते हैं तो वो 20 साल से भी कम उम्र के हैं और जब गांधी आंदोलन शुरू करते हैं तो 50 साल की उम्र के आस पास है। उन दोनों में यही यूवा और वृद्ध का फर्क है।

  •   गांधी शालीनता से धीरे धीरे बोलते थे तो भगत सिंह तेवर और जोश के साथ  में  बोलते थे।
  •   गांधी परम्परवादिता के खिलाफ एक हिचक रखते थे क्योंकी वो नहिं चाहते थे की आंदोलन के रास्ते में कोई और बहस शुरू हो वहीं भगत सिंह परम्परवादिता और रूढ़िवादिता के खिलाफ बेबाक बोलते थे।
  •   गांधी अंग्रेज़ो की गलती बस गिनाते थे जबकि भगत सिंह उनकी गलती न सिर्फ गिनाते बल्कि ये भी चेता देते की इसका अंजाम बुरा होगा। हम लड़ते रहेंगे जब तक ये अन्याय जारी रहेगा।

गांधी और भगत सिंह में उम्र का बस यही मनोवैज्ञानिक फर्क था। न गांधी कायर थे और न ही भगत सिंह हिंसक।

इस बात को आप एक उदाहरण से समझ लीजिये। यदि आप युवा है और आपकी किसी से लड़ाई हो जाये। आपको कई लोगो द्वारा मिलकर मारा गया हो। तो आपके और आपके घर के सभी युवा लोगों के मन में उनको बस मारने की ही बात होगी। लेकिन आपके घर के जो भी समझदार 40-50 की उम्र के लोग होंगे उनके मन में ये ही ख्याल होगा की इस मसले को बात-चित से हल किया जाए न की लड़ाई झगड़े से। ये उम्र का एक मनोवैज्ञानिक सोच का फर्क है। यही फर्क गांधी और भगत सिंह के बीच भी था।

एक व्यक्तिगत उदाहरण देता हूँ। जब मैं छोटा था, हद से ज्यादा उछल कूद करने पर मेरी नानी बार बार मुझे मना करती की चोट लग जाएगी , गिर जाओगे। मेरे मन में एक ही ख्याल आता था नानी कितनी डरती हैं। फिर मैं बड़ा हुआ मेरा भाई 10 साल का है। वही हरकतें अब वो भी करता है। वही चोट लगने और गिरने की बात अब मैं उसे बोलता हूँ। उसके मन में भी वही बात आती होगी की मैं कितना डरपोक हूँ। लेकिन न मेरी नानी डरपोक हैं, न मैं हूँ और न हीं गांधी थे।

किसी चीज़ को देखने और समझने का नजरिया सबका अलग होता है। गांधी का भी बिल्कुल साफ तर्क था की हिंसा को अपनाकर सत्ता को खुद को और अपने आन्दोलन को कुचल डालने का मौका मत दो।


By - Kashish Bagi


चेतावनी - लेखक तर्क की दुनिया का टॉम क्रूज है। अतः बिना गहन जानकारी के उससे वाद विवाद में न उलझें। आप अपनी साकारत्मक और नकारात्मक प्रतिक्रिया कमेंट में दे सकते हैं। शुक्रिया


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