UA-149348414-1 रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,

 रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,


रचनाकार - रामधारी सिंह दिनकर
रचनाकाल - 1946

Ramdhari-singh-dinkar


प्रसंग - 

इस कविता में कवि ने मनुष्य और चांद के बीच के संवाद की कल्पना की है। मनुष्य की व्याख्या संघर्षशील और निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहने वाले प्राणी की रूप में की गई है।

विशेष टिप्पड़ी -

यह कविता उस उक्ति का एक बेहतरीन उदाहरण है जिसमे यह कहा जाता है कि "जहां न पहुचे रवि वहां पहुंचे कवि" क्योंकि इस कविता की रचना कवि ने 1946 में की थी और उसमे रामधारी सिंह दिनकर चांद को चेतावनी देते हुए कहते हैं ये स्वप्न देखने और उन स्वप्नों को पूरा करने वाले मनुष्य चांद तक आने वाले है, जबकि मनुष्य द्वारा चांद पर पहला कदम 20 जुलाई 1969 को रखा गया था। यह कवि की दूरदर्शी कल्पना का एक अद्वितीय उदाहरण है।



कविता -


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रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,

आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!

उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,

और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।


जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?

मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;

और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी

चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।


आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का;

आज उठता और कल फिर फूट जाता है;

किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो?

बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।


मैं न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली, जुल

देख फिर से, चाँद! मुझको जानता है तू?

स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?

आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?


मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,

आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ,

और उस पर नींव रखती हूँ नये घर की,

इस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ।


मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी

कल्पना की जीभ में भी धार होती है,

वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,

स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।


स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे,

"रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,

रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,

स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।"


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-समाप्त

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