UA-149348414-1 किसान - कृषि अध्यादेश और मोदी सरकार की हकीकत

किसान - कृषि अध्यादेश और मोदी सरकार की हकीकत




Anti-bjp


भारत अंग्रेज़ो की गुलामी से लम्बे संघर्षों और अनगिनत बलिदानों के बाद 15 अगस्त, 1947 को आजाद हुआ। अगर तकनीकी रूप से कहा जाए तो यह पूर्ण रूप से आजादी नहीं बल्कि मात्र एक सत्ता हस्तांतरण ही था। अभी भारत को जमीनी तौर पर आज़ादी पाना बाकी था। भारत के पास सबसे बड़ी समस्या यह थी कि 37 करोङ भारतीय(1948 की जनगणना के अनुसार) जो आजाद फिजा में सांस तो ले रहे हैं लेकिन वो खाएंगे क्या? खाद्यान्न पर्याप्त नहीं थे। जो वर्ग सत्ता पाकर, सरकार बना कर खुश था , एक बार फिर उसने पीछे मुड़कर उस गुमनाम भीड़ की ओर देखा जीस भीड़ ने चम्पारण से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक तमाम आंदोलनों को सफल बनाया था। वो भीड़ थी बिना नाम ,तमगे,उपहार,अवार्ड के काम करने वाली आम जनता का विशेषतः भारतीय किसान और मजदूर।
                             आजादी के बाद 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना की नींव डाली गई और योजना आयोग का गठन हुआ। जवाहर लाल नेहरू योजना आयोग के अध्य्क्ष और गुलजारी लाल नन्दा उपाध्यक्ष थे। आगे के आंकड़ों को गौर कीजियेगा-

 8 दिसम्बर 1951 को पहली पंचवर्षीय योजना को संसद में पेश किया गया । इस योजना में सकल घरेलू उत्पाद(GDP) का लक्ष्य मात्र 2.1% रखा गया था।इस योजना में कृषि पर विशेष जोर दिया गया तथा साथ ही केवल 5 इस्पात संयंत्रों की नींव रखी गयी। योजना का आकार 2069 करोङ रुपये का था। 1956 में पहली पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल समाप्त हुआ और हम आशा के विपरीत इन 5 वर्षों में 3% की GDP के साथ विकास किये थे।
              पहली पंचवर्षीय योजना की सफलता का पूरा श्रेय भारतीय किसानों की जी तोड़ मेहनत को जाता है। अगली पंचवर्षीय योजनाओं में भी किसानों का योगदान अतुलनीय रहा। सब कुछ ठीक चल ही चल रहा था कि हम 1962 का चीन युद्ध उपयोगी हथियारों की कमी की वजह से हार गए। यह एक राष्ट्रीय हार थी। एक-एक भारतीय की हार।उस दौर के अगर हम सराकरी समझौतों को विस्तार से पढ़े और गहराई से समझे तो यह केवल आम युद्ध की हार नही बल्कि एक अपमान और मनोबल तोड़ने वाली हार थी। दुश्मन हमारी कमजोर स्थिति की ताक में हमेशा रहता है। यही हुआ और मात्र 3 साल बाद 1965 में भारत-पाक युद्ध की शुरुआत हुई। इस बार भारत का जो प्रधान मंत्री था वो एक गरीब किसान का बेटा था। जो बचपन में स्कूल जाने के लिए अपनी किताबों को सर पर रख कर गंगा को पार करता था। एक ईमानदार राजनेता, एक कर्मठ और साधारण सा दिखने वाला प्रधानमन्त्री जिनका नाम था लाल बहादुर शास्त्री। जिसके बारे में पाकिस्तान की सोच थी कि वो ठिगना क्या करेगा? उसी 1965 के युद्ध के दौरान लालबहादुर शास्त्री ने जवानों का मनोबल बढ़ाने के लिए नारा दिया "जय जवान-जय किसान"। तब की सरकार किसानों की वास्तव में हितैषी थी। होती भी क्यो नहीं भारत की तरक्की का नींव ही किसान थे।

किसान आत्महत्या की शुरुआत-


1990 से किसान आत्महत्या के मामले आना शुरू हुए। 1990 में प्रसिद्ध अंग्रेजी अखबार द हिन्दू के संवाददाता पी. साईंनाथ ने किसान आत्महत्या की पहली बार सूचना दी। एक अनुमान के तहत 1990 के बाद से प्रतिवर्ष औसतन 10 हज़ार किसानो की आत्महत्या की रिपोर्ट दर्ज की गई। 1997 से 2006 के बीच 1,66,304 किसानों ने आत्महत्या की। यह सरकारी आंकड़े है यथार्थ आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है।
                   भरतीय अपराध लेखा कार्यकाल के आंकड़ों के अनुसार भारत भर में 2008 में 16,196 किसानों ने आत्महत्याएं की थी। 2009 में 17,368 किसान। राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय द्वारा प्रस्तुत किये गए आंकड़ो के अनुसार 1995 से 2011 के बीच 17 वर्षों में 7 लाख 50 हज़ार 860 किसानों ने आत्महत्या की।
 जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि 1990 के बाद लगभग 1 करोङ से भी ज्यादा किसानों ने खेती करना छोड़ दिया।

वर्तमान सरकार में किसानों की स्थिति-


अगर आप वर्तमान में सरकार से किसान आत्महत्या के आंकड़े की मांग करेंगे तो उनका जवाब होगा कि हमारे पास कोई आंकड़ा नहीं है। 2015 के बाद से सरकार ने अपनी वेबसाइट पर आंकड़ों को अपडेट ही नहीं किया। मतलब सरकार के पास 2016 से किसान आत्महत्या के कोई आंकड़े नहीं है या यह कहा जा सकता है कि सरकार ने जानबुझकर आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए हैं।
                  टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार 2018 मई महीने में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 2013 से हर साल 12000 किसान आत्महत्या कर लेते है। ध्यान दीजिए यह 12000, 90 के दशक से चला आ रहा है। अगर इसमें कोई सरकार सुधार की होती यो जरूर वो चीख चीख कर सीना पट कर चिल्लाती की हमने ये कर दिखाया। लेकिन संख्या आज भी 12000 ही है क्या पता इससे कहीं ज्यादा ही हो।
             किसानों की स्थिति को लेकर एनजीओ सिटीजन रिसोर्स एन्ड एक्शन इनिशिएटिव की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका के सम्बंध में सुनवाई के दौरान केंद्र की सरकार की तरफ से अतिरिक्त सालिसिटर पीएस नरसिम्हा ने कहा था- ' हम कम आय वाले किसानों पर ध्यान दे रहे हैं।' सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 2015 में 12,602 लोगों ने आत्महत्या कि यह आंकड़ा उस साल देश मे सभी आत्महत्याओं के दर्ज मामलों का 9.4 % था जो अकेले कृषि से जुड़ा था। 4291 आत्महत्याओं के साथ महाराष्ट्र शीर्ष पर हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ ,आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु इन 7 राज्यों में ही देश की कुल किसान आत्महत्या का 87.5% आत्महत्या दर्ज है।
                2016 के बाद से किसान आत्महत्या के आंकड़े सरकार ने जुटाना ही बन्द कर दिए। अब मेरा एक व्यक्तिगत सवाल है कि सरकार ने पीड़ितों को चिन्हित करना ही बन्द कर दिया तो सरकार कैसे उनके लिये काम करती है?
            इसी बीच जब खबर ये सुनाई देती है कि तमिलनाडु से किसानों का एक समूह दिल्ली जंतर मंतर पर अपने साथी की लाश लेकर बैठा है और पुलिस उनपर लाठियां और पानी के फव्वारे बरसाती है तो दिमाग की मनोस्थिति अलग ही स्तर की होती है।

नोट- उपर किसानों की आत्महत्या से जुड़े सभी आकंड़े, द वायर, द हिन्दू जैसे प्रतिष्ठित अखबारों, भारत सरकार की अपराध मामलों से जुड़ी वेबसाइट और विकिपीडिया से लिया गया है।

फिर आया साल 2020 


14 सितम्बर 2020 को सदन में 3 बिल पेश किए गए जो  निम्न है -

  • The Farmers’ Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Bill, 2020;

  •  The Farmers (Empowerment and Protection) Agreement of Price Assurance and Farm Services Bill, 2020 

  • The Essential Commodities (Amendment) Bill, 2020

सरकार का दावा है कि वो इन बिल के जरिये किसानों की दशा सुधार में क्रांति ला रही है। जो 70 सालो का शोषण किसानों का जारी था उसे मोदी सरकार एक झटके में खत्म करने वाली है। ऐसा प्रधानमंत्री मोदी ने खुद कहा। जबकि हकीकत यह है कि देश भर में किसान और उनसे जुड़ी संस्थाएं इस बिल का विरोध कर रहे है । इस पर प्रधानमंत्री का  ये भी कहना है कि वो लोग जो किसानों का शोषण करते हैं वो किसानों को गुमराह कर रहे हैं। उनके कहने का मोटी मोटा तातपर्य यही है कि किसान जो विरोध कर रहे हैं उन्हें इस बिल की समझ है ही नहीं। यह बिल उनके फायदे के लिए है।
     मुझे इतिहास का वो प्रसंग याद आता है कि जब इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के पास भारत के नेताओं ने अंग्रेजो के बनाये  काले कानूनों औए शोषण की बात रखी तो अंग्रेज़ हुक्मरानों ने अपना बचाव इसी तरीके से किया था कि ये कानून भारतीयों के हित के लिए है और उनकी दशा सुधारने के लिए है।
     आप बस गौर कर के देखिए कि अगर मैं कहूँ आओ मेरे पास आपके भले के लिए एक चीज़ है तो पहले आप उस चीज़ को देखने आएंगे न कि सड़कों पर पुलिस की लाठियां खाकर मेरा विरोध करेंगे। अगर यह विरोध सिर्फ संसद तक होता तो माना जा सकता था कि ये विरोध सिर्फ विपक्ष की तरफ से है लेकिन ये विरोध संसद से पहले जुलाई से किसानों द्वारा सड़क से शूरु किया गया था, तो विरोध नासमझी की नही बल्कि अपने हक और अधिकार की है। बाकी सबका तो छोड़िए इस बिल का विरोध खुद भाजपा की मातृ संस्था RSS द्वारा संचालित किसान संगठन कर रहै हैं। ये कौन सा बिल है जो आप अपने ही लोगों को ही न समझा पाए और ना ही किसी भी किसान-कृषि एसोशिएन कि सहमति या राय ही लिया।


क्यों है इस बिल का विरोध -

Source - The Hindu

सहकारी संघवाद


चूंकि कृषि और बाजार राज्य सूची का विषय हैं  तो अध्यादेशों को राज्यों के कार्यों पर प्रत्यक्ष अतिक्रमण और संविधान में निहित सहकारी संघवाद की भावना के खिलाफ देखा जा रहा है।  हालांकि, केंद्र ने तर्क दिया कि खाद्य पदार्थों में व्यापार और वाणिज्य समवर्ती सूची का हिस्सा है, इस प्रकार यह संवैधानिक स्वामित्व प्रदान करता है।

MSP के लिए अंत?


 किसानों का उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अध्यादेश किसानों के लिए अधिसूचित कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) मंडियों के बाहर कृषि बिक्री और विपणन खोलने का लक्ष्य रखता है, अंतर-राज्य व्यापार के लिए बाधाओं को दूर करता है और कृषि उपज के इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग के लिए एक ढांचा प्रदान करता है।  यह राज्य सरकारों को एपीएमसी बाजारों के बाहर व्यापार शुल्क, उपकर या लेवी एकत्र करने से रोकता है।

 पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार, एपीएमसी को किसानों की उपज की प्रभावी खोज के लिए खरीदारों और विक्रेताओं के बीच उचित व्यापार सुनिश्चित करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया था।  एपीएमसी खरीदारों, कमीशन एजेंटों और निजी बाजारों को लाइसेंस प्रदान करके किसानों की उपज के व्यापार को विनियमित कर सकता है;  इस तरह के व्यापार पर लेवी बाजार शुल्क या कोई अन्य शुल्क;  और व्यापार को सुविधाजनक बनाने के लिए अपने बाजारों के भीतर आवश्यक बुनियादी ढाँचा प्रदान करते हैं।

विरोध करने वाले एपीएमसी के एकाधिकार के विघटन को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर खाद्यान्न की सुनिश्चित खरीद को समाप्त करने के संकेत के रूप में देखते हैं।  केंद्र के 'एक राष्ट्र, एक बाजार' कॉल के लिए, आलोचकों ने 'एक राष्ट्र, एक एमएसपी' मांगा है।

 विरोधियों का तर्क है कि बड़ी संख्या में किसानों को उनकी उपज के लिए एमएसपी प्राप्त करना और एपीएमसी में किंक को सीधा करना, इसके बजाय इन राज्य तंत्रों को निरर्थक बनाना समय की आवश्यकता है।

अनुबंध खेती के लिए रूपरेखा


 मूल्य आश्वासन और फार्म सेवा अध्यादेश का किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) अनुबंध कृषि से संबंधित है, जो कृषि उपज की बिक्री और खरीद के लिए व्यापार समझौतों पर एक रूपरेखा प्रदान करता है।  कानून में परिकल्पित पारस्परिक रूप से सहमत पारिश्रमिक मूल्य ढांचे को किसानों की रक्षा और सशक्त बनाने वाले के रूप में पेश किया गया है।

 लिखित कृषि समझौता, किसी भी कृषि उपज के उत्पादन या पालन से पहले दर्ज किया गया, आपूर्ति और गुणवत्ता, ग्रेड, मानकों और कृषि उपज और सेवाओं की कीमत के लिए नियमों और शर्तों को सूचीबद्ध करता है।

 खरीद के लिए भुगतान की जाने वाली कीमत समझौते में उल्लिखित की जानी है।  विविधताओं के अधीन कीमतों के मामले में, समझौते में ऐसी उपज के लिए भुगतान की जाने वाली गारंटीकृत कीमत शामिल होनी चाहिए, और एक स्पष्ट संदर्भ - प्रचलित कीमतों या किसी अन्य उपयुक्त बेंचमार्क कीमतों से जुड़ा हुआ - किसी भी अतिरिक्त राशि के लिए गारंटी मूल्य से ऊपर और ऊपर,  बोनस या प्रीमियम सहित।  इस तरह की कीमत निर्धारित करने की विधि, गारंटीकृत मूल्य और अतिरिक्त राशि सहित, अनुबंध में अनुबंध के रूप में प्रदान की जाएगी।



मूल्य निर्धारण के लिए कोई तंत्र नहीं


 मूल्य आश्वासन विधेयक, किसानों को मूल्य शोषण के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करते हुए, मूल्य निर्धारण के लिए तंत्र को निर्धारित नहीं करता है।  ऐसी आशंका है कि निजी कॉरपोरेट घरानों को दिए जाने वाले फ्री हैंड से किसान का शोषण हो सकता है।

 कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग देश के किसानों के लिए एक नई अवधारणा नहीं है - अन्न, अनाज और पोल्ट्री क्षेत्रों में औपचारिक अनुबंधों के लिए अनौपचारिक अनुबंध आम हैं।  खेत क्षेत्र की असंगठित प्रकृति और निजी कॉर्पोरेट संस्थाओं के साथ कानूनी लड़ाई के लिए संसाधनों की कमी के कारण औपचारिक  दायित्वों के बारे में आलोचक आशंकित हैं।

खाद्य पदार्थों का अपव्यय


 आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू को आवश्यक वस्तुओं की सूची से हटा देता है।  संशोधन इन खाद्य वस्तुओं के उत्पादन, भंडारण, संचलन और वितरण को निष्क्रिय कर देगा।  केंद्र सरकार को युद्ध, अकाल, असाधारण मूल्य वृद्धि और प्राकृतिक आपदा के दौरान आपूर्ति के विनियमन की अनुमति है, जबकि ऐसे समय में निर्यातकों और प्रोसेसर के लिए छूट प्रदान करते हैं।

 अध्यादेश के लिए आवश्यक है कि कृषि उपज पर किसी भी स्टॉक सीमा को लागू करना मूल्य वृद्धि पर आधारित होना चाहिए।  स्टॉक सीमा केवल तभी लगाई जा सकती है जब बागवानी उत्पादों के खुदरा मूल्य में 100% की वृद्धि हो;  पीआरएस के अनुसार गैर-खराब कृषि खाद्य पदार्थों के खुदरा मूल्य में 50% की वृद्धि।

खाद्य सुरक्षा कम?


 पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने खाद्य पदार्थों के नियमन में ढील पर कहा, यह फसल के मौसम के दौरान निर्यातकों, प्रोसेसर और व्यापारियों को फ़सल उत्पादन के लिए प्रेरित करेगा, जब कीमतें आम तौर पर कम होती हैं, और कीमतें बढ़ने पर बाद में इसे जारी करती हैं।  उन्होंने कहा कि यह खाद्य सुरक्षा को कमजोर कर सकता है क्योंकि राज्यों को राज्य के भीतर स्टॉक की उपलब्धता के बारे में कोई जानकारी नहीं होगी।

विरोधियों ने आवश्यक कीमतों और बढ़े हुए कालाबाजारी के मूल्यों में अतार्किक अस्थिरता का अनुमान लगाया।

मोदी सरकार जो भी नए कदम उठाती है उसके साथ वो मुंगेरी लाल के के हसीन और रंगीन सपने भी दिखती है जो अंततः सिर्फ एक जुमला बन कर ही रह जाता है। फिर वो नोटबन्दी हो या जीएसटी हो ,उसके साथ लंबे चौड़े दावे किए गए थे लेकिन उन दावों की हकीकत खुद मोदी सरकार भी जानती है। बस मोदी सरकार से एक  सवाल पूछ लेना चहिए -

Anti-BJP


_Kashish Bagi

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