UA-149348414-1 राष्ट्रवाद की बाधाएं एवम इसका समाधान

 राष्ट्रवाद की बाधाएं एवम इसका समाधान


Raashtrvad


‘राष्ट्रवाद’ का प्रतिपादक जॉन गॉटफ्रेड हर्डर था जिसने अठारहवीं सदी में पहली बार इस शब्द का प्रयोग करके जर्मन राष्ट्रवाद की नींव रखी थी। उसने समान उत्पत्ति और भाषा का हवाला देकर जर्मनों को अपने को एक ‘राष्ट्र’ मान कर संगठित होने का आह्वान किया। मूल रूप से साहित्यालोचक हर्डर को भी अनुमान नहीं रहा होगा कि उसका यह वैचारिक आविष्कार दुनिया को कितना बदल कर रख देगा और उसके इस एक राष्ट्र के रूप में संगठित होने के विचार से दुनीया में कितनी तबाही आएगी।

       जब समूचा विश्व राष्ट्रवाद के नाम पर प्रथम विश्व युद्ध के आग में जल रहा था , उन दिनों 1916/17 के वक्त रविन्द्र नाथ टैगोर जापान और अमेरिका की यात्रा पर थे। इस दौर के राष्ट्रवाद पे उनके व्याख्यान काफी प्रसिद्ध है। उन्होंने राष्ट्र के बारे में कहा था कि - ‘राष्ट्र का विचार मानव द्वारा आविष्कृत बेहोशी की सबसे शक्तिशाली दवा है। इसके धुएं के असर से पूरा देश, नैतिक विकृति के प्रति बिना सचेत हुए, स्वार्थ-सिद्धि के सांघातिक कार्यक्रम को व्यवस्थित ढंग से लागू कर सकता है।’

       भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सबसे बड़े नेता गांधी भी खुद को कभी राष्ट्रवाद की सीमा में नही बांध पाए। भारतीय राष्ट्रवाद की चर्चा होने पर इसकी तुलना यूरोपीय राष्ट्रवाद से की जाती है और यह मान लिया जाता है की "भारत कभी एक राष्ट्र रहा ही नही" बल्कि "भारत अनेक राष्ट्रीयताओं का देश है"। असल में यूरोप में समरूपता और समानता राष्ट्रवाद का आधार रही हैं। इस आधार पर यह मान लिया जाता है की भारत अनेक राष्ट्रीयताओं का एक देश है। 


बाधाएं -


       राष्ट्रवाद के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा साम्प्रदायिकता है। आज कोई भी ऐसा देश शायद ही होगा जो राष्ट्रवाद रहित हो। किसी भी देश के समस्त भू भाग में कई धर्म और सम्प्रदाय के लोग रहते हैं। उनकी संख्या के आधार बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की कल्पना पनपती है। फिर वहाँ के राष्ट्रवाद में बहुसंख्यक धर्म का प्रवेश आरम्भ होता है। जिससे एक राष्ट्र में निवास करने वाले विभिन्न सम्प्रदायों के बीच वैमनस्व बढ़ता है। जिससे असहिष्णुता का जन्म होता है जो उस राष्ट्र की एकता को प्रभावित करता है। खाड़ी देशो का इस्लामिक राष्ट्रवाद और भारत का हिन्दू राष्ट्रवाद के कारण फैली वैमनस्व इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं।


          राष्ट्रवाद के मार्ग में दूसरी बाधा है इसका एक संस्कृति पर केंद्रित हो होना। उसी संस्कृति को राष्ट्रवाद का आधार मानना। राष्ट्रवाद के नाम पर एक संस्कृति को श्रेष्ठ मानकर  जब उसी राष्ट्र में निवास करने वाले दूसरे संस्कृति के लोगो के खाने , पहनने का ढंग निर्धारित किया जाता है तो ये असहिष्णुता और वैमन्सव का पर्याय बनती है। जर्मनी का राष्ट्रवाद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। नाजी राष्ट्रवाद के नाम पर इतना वैमन्सव बढ़ा की विश्व युद्ध का एक अहम कारण बन कर उभरा ।

          राष्ट्रवाद के मार्ग में तीसरी बाधा है राजनीति द्वारा उसका गलत ढंग से उपयोग। भारत जैसे बहु संस्कति वाले देश में संस्कति और धर्म आधारित राष्ट्रवाद के नाम सत्ता बनती और बिगड़ती है।। खाड़ी देशो में सालो से चले आ रहे गृह युद्ध भी राष्ट्रवाद के राजनीतिकरण  और धार्मिकिकरण की ही देन है।

          वैश्वीकरण के इस दौर में राष्ट्रवाद के नाम पर एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र से बेहतर समझा जाता है। जिससे विश्व स्तर पर द्वेष बढ़ता है । जो युद्घ और हिंसा को जन्म देता है।

           ये सभी कमियां राष्ट्रवाद के मार्ग में बाधाएं हैं।


समाधान -

      व्यवहार में राष्ट्रवाद के दो रूप होते है , पहला उदार राष्ट्रवाद और दूसरा उग्र राष्ट्रवाद। उपरोक्त लिखित राष्ट्रवाद की बाधाएँ विशेषतः उग्र राष्ट्रवाद से जन्म लेती है। हमे इसके समाधान के लिए राष्ट्रवाद को संस्कृति और धर्म से अलग रकहना होगा। हमे ये  केवल सिधान्तो में ही नही बल्कि व्यवहार में भी स्वीकार करना होगा की राष्ट्र का मतलब सिर्फ जमीन के टुकड़े से नही हैं बल्कि उसमे निवास करने वाले हरेक धर्म, सम्प्रदाय ,भाषा, जाती वाले लोगो से है। हमे उग्र राष्ट्रवाद को त्यागकर उदार राष्ट्रवाद की कल्पना को अपनाना होगा। हमे दूसरे संस्कृति , धर्म , राष्ट्र की श्रेष्ठता का सम्मान करना होगा। असहिष्णुता और साम्प्रदायिकता को पीछे छोड़ना होगा। इतिहास की धारा भी विचित्र है। ‘नकारात्मक’ राष्ट्रवाद के लिए आज एक सकारात्मक भूमिका दिखाई दे रही है- विश्व शांति और कल्याण के लिए। धार्मिक विकृति और धर्म आधारित हिंसा और आतंकवाद के मुकाबले के लिए उदार राष्ट्रवाद प्रयुक्त हो सकता है। इन संकटों का सामना कर रहे देशों के समक्ष चुनौती यह है कि वे किसी धार्मिक राज्य का अंग बन कर अपनी राष्ट्रीयता को मिट जाने दें या फिर बहुसांस्कृतिक राष्ट्रवादी अस्मिता के अमोघ अस्त्र से इन शक्तियों का शमन करें और दुनिया को बहुरंगी बने रहने दें, जैसा कि प्रकृति ने इसे सिरजा है।


By - Kashish Bagi



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