UA-149348414-1 Mujhse Pahli Si Mohabbat Mere Mehboob Na Mang

 Mujhse Pahli Si Mohabbat Mere Mehboob Na Maang - A letter to Faiz

Faiz Ahmad faiz


मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग,

और भी दुख हैं जमाने मे मोहब्बत के सिवा,

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा,

लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे,

अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे,

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग,

तो अब लगता है ऐसा क्या हुआ फ़ैज़,

किस बात ने परेशां किया,

तुमने हाथ क्या उठा लिया मोहब्बत से,

मोहब्बत ने कितनों पर हाथ उठा दिया,

अच्छे खासे काम-काजी घर जा बैठे,

और निकम्मों ने लिख-लिख कर इतना नाम कमा लिया,

तो कोई पूछे कि ऐसा क्या हुआ फ़ैज़,

जो जवानी मिलती है बरबाद होने को,

उसमें खाम खां क्यों आजाद हो गए,

दो बातें की और चार शेर लिखे,

हमें तो ले डूबे और खुद आबाद हो गए,

कुछ तो हुआ होगा, 

कुछ देखा होगा नज़रों ने,

नहीं तो किसी ने कुछ कहा जरूर होगा,

दिल बड़ा था तुम्हारा,

मुश्किल था किसी गैर का सारी मोहब्बत लूट कर ले जाना,

दिल मे चोर तुम्हारे भी रहा जरूर होगा,

तो कोई पूछे- जो डूबे रहते थे कभी,

क्यों धँसने-छटपटाने लगे बाहों में उनकी,

अपनी एक-उनकी एक धड़कनों की चादर बुनी,

झटके से फिर उधेड़कर क्यों चले गए सांसो से उनकी,

तुम कहते हो नज़र लौट गयी थी तुम्हारी,

चलो ये भी माना,

जब किसी के जख्म नासूर बन गए होंगे,

जमीर दुखने लगा होगा,

शब्द छिल गये होंगे,

ईमान झुकने लगा होगा,

तब नज़रें तैर गयीं होंगी सनम की आंखों से,

यूं अश्क किनारा कर गए,

कि तुम इश्क में फिर पड़ गए,

कि गिर पड़े - तुम रो दिए,

तुम रोने से कतराते थे,

हंसते थे हालातों पर,

तुम हंसकर भी पछताते थे,

किस बात ने हैरां किया?

मखमल में लिपटी लाशों ने?

बची-खुची कुछ सांसो ने?

इंसानो ने?

हैवानो ने?

मुर्दा सी नन्हीं जानों ने?

किस बात ने हैरां किया?

मजहब और धर्म ने जब बांट दिया इंसनो को,

काट दिया दो टुकड़ों में,

और नाम दिया शैतानो को,

वो बन्दे नहीं थे अल्लाह के,

वो काफ़िर थे,

वो भक्त नहीं,

भटके हुए मुसाफिर थे,

खुदा परस्त लोगों को,

जब खुदा नहीं मिला तो,

उन्होंने दिल बहुत छोटा कर लिया,

छोटे दिलों से मोहब्बत नहीं हुई,

और उन्होंने क्या किया?

मोहब्बत को मार दिया,

जुबां खींच ली,

शब्द काट दिए,

सोच रौंद दि,

जिस्म बांट दिए,

कुचल कर चले गए जज्बात सारे,

पैर मोहब्बत पर भी पड़ गए,

फिर कहते क्या न करते फ़ैज़,

तुमने भी इंकार किया,

जैसे थे जिंदा तो थे,

ये इश्क विश्क बेकार किया,

बड़ी जिल्लत है इश्क में,

बड़ी हिम्मत करनी पड़ती है,

इतनी-इतनी खुशियों की भी कीमत भरनी पड़ती है,

तुम्हारी ही तरह मुझे भी कभी रास नहीं आयी मोहब्बत,

कभी कोई अपना होता है तो फर्ज मोहब्बत,

कभी मांग ली किसी गैर से तो कर्ज मोहब्बत,

कभी हाल चाल पूछने के पीछे सवाल मोहब्बत,

तो कभी जवाब में हां सुनने का ख्वाब मोहब्बत,

मोहब्बत न हुई मुसीबत हो गयी,

मैंने किनारा तो कर लिया,

पर कभी किसी आंखों के इशारे,

कभी किसी होंठो के सहारे,

एक तरफा में जीत गये,

कभी दोनो तरफों से हारे,

हार गए,

जमाने के रँजों गम ने हरा दिया,

मोहब्बत हुई भी तो मिली नहीं,

मिली तो बड़ी देर से,

जब मिली तो ये जाहिल अपनी माशूकाओं को सब दे आया,

चाँद के टुकड़े कर दिए,

सारे तारे दे आये,

फूल नोंचकर ले गए,

सारी बहारे दे आये,

धूप भर ले गए जेबों में,

बारिशें उनके नाम कर दी,

इन कम्बख्तों ने पी पी कर,

शराब तक हराम कर दी,

आशिकी,मौसिकी, शायरी लफ्जों का ढेर लगाए,

अब ज्यादा से ज्यादा वो भी क्या करती?

ना कर देती,

अरे मेरे हिस्से की जिल्लत भी उठा आये,

तो कुछ इसलिए भी खुदा खैरात में चन्द लोग दे दिया करता है,

क्योंकि वो समझता है,

वो समझता है कि आशिकी जितनी मेहनत,

गर खुदा हर रिश्ते में करवाये,

तो टेक टेक कर इजहार-ए-मोहब्बत में,

उसके बन्दों के घुटने घिस जाये,

तो ये जान लो,

दिन कम हैं और लोग बहुत,

उम्र भर का साथ नहीं,

नफरत को क्या चाहिए?

दो बातें काफी है,

पर मोहब्बत?

मोहब्बत हर किसी के वश की बात नहीं,

तुम जाओ,

एक उम्र पड़ी है तुम्हारे आगे,

पर शायद मैं न कर पाऊं अब ये सब कभी,

क्योंकि मोहब्बत के सारे शौक,

सारे फर्ज,

सारे दर्द,

सिर्फ एक बार मीले तो ही जायज लगते हैं,

क्यों लिखा है मालूम नहीं,

पर क्या खूब लिखा है फ़ैज़,

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग....

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग......¡!


Source - Jyoti Mamgain's Suno Jam poetry Youtube

(This beautiful and outstanding poem has been written by Jyoti Mamgain. Click on above link and visit her youtube profile.We do not claim copyright for this poem)


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