UA-149348414-1 सरस्वती पूजा पर पापा व पापा के परियों एवं उनके चाचा मामा भाई के नाम नारीवाद पर एक सन्देश -Pseudo Feminism in Hindi

सरस्वती पूजा पर पापा व पापा के परियों एवं उनके चाचा मामा भाई के नाम नारीवाद पर एक सन्देश - Feminism in Hindi


 Feminism in Hindi
 Feminism in Hindi


एक गिलास पानी साथ रखिए। जो कहने वाला हूँ, शायद उसे गले से उतारने में जरुरत पड़े।
पाँच बातें हैं अजीब सी -
1. औरत देवी का रूप नहीं होती -
जब भी किसी ने औरत को दुर्गा, काली, लक्ष्मी या सरस्वती का रूप कहा, सभी औरतें खुश हो गई।
उन्होंने कहा कि आपकी पूजा करनी है, और औरत ख़ुशी से ऊँचे चबूतरे पर जा बैठी। हा.हा.हा। कभी किसी क़ैदी को इतनी ख़ुशी से बेड़ियाँ पहनते हुए नहीं देखा होगा आपने। बेड़ियाँ सोने की हो, तो इसका मतलब ये तो नहीं कि पहन ली जाए।
पूजा का दिन गया, और अगला दिन आया। औरत चबूतरे से उतरने लगी। उन्होंने पूछा कि नीचे क्यों उतर रही हो?
औरत ने कहा कि मुझे सिनेमा हॉल में फिल्म देखने जाना है। विलायत जाना है पढ़ाई के लिए। डिस्को जाने का मन है। जींस पहनकर बॉयफ्रैंड के साथ वैलेंटाइन डे मनाने जाना है। आज रात सहेली के घर पर उसके जन्मदिन की पार्टी करनी है।
उन्होंने कहा कि पागल हो क्या? ऐसा नहीं करते।
क्यों? भाई भी तो अपने दोस्तों के साथ घूमने गया हुआ है। बीयर भी पीकर आएगा।
ओफ्फ! भूल गई कल की बात? तुमने खुद तो ये माना था कि तुम देवी हो। चबूतरे पर बैठी रहो। लक्ष्मण रेखा के अंदर रहो। मर्यादा की दीवारों में रहो।
वह चुपचाप वापस बैठ गई।
सभी धर्म पुरुषों ने बनाए। सभी "भगवान" को पुरुष बनाया।
किसी को यह कहते हुए सुना है कि अल्लाह हमें देख 'रही' है? नहीं, अल्लाह हमें देख 'रहा' है। गॉड भी 'He' हो जाता है, 'She' नहीं। ब्रह्मा-विष्णु-महेश भी सब पुरुष हैं।
फिर, औरतों को कहीं समायोजित करने के लिए उन्होंने विष्णु के चरणों में लक्ष्मी को बैठा दिया।
राधा आजीवन कृष्ण के विरह में तड़पती रही।
सीता राम के पीछे-पीछे चलती रही।
पार्वती शिव के लिए भाँग घोटने लगी।
बहुत से देवताओं ने एक से ज़्यादा शादी रच ली। लेकिन औरत को पाँच पति मिले, तो कुंती के यह कहने पर कि जो सामान लाए हो, उसे आपस में बाँट लो।
औरत ने देवता की पूजा की, तो देवता ने खुश होकर उस भक्तिन से शादी कर ली। भक्त ने देवी की पूजा की, तो उसे माँ ही कहा।
जिन देवियों को शक्तिशाली दिखाया तो कभी उनका कोई पति नहीं दिखाया गया।
औरतों को कहा गया कि पति को परमेश्वर मानना चाहिए।
लेकिन धर्म ऐसी चीज़ है, जिस पर आप सवाल नहीं करेंगी। चाहे आप पढ़ी-लिखी डॉक्टर हों, न्यायधीश हों, या इंजीनियर, आप करवाचौथ का व्रत रखेंगी ही। नहीं तो आपको पाप लग जाने का खतरा रहेगा।
रूढ़िवादी कट्टरपंथी तो धर्म और संस्कृति के नाम पर औरतों पर लगे शिकंजों को सही ठहराते रहेंगे ही, बहुत से उदारवादी हिंदू-मुस्लिम धर्म की उदारवादी व्याख्या प्रस्तुत करने की कोशिश करते रहेंगे। इनमें से बहुत से लोग असल में कट्टरपंथी होते हैं जिन्होंने उदारवाद का मुखौटा पहन रखा है।
सुनो, इस धर्म-पुस्तक को इस नज़रिए से नहीं, दूसरे नज़रिए से देखो। आगे से, पीछे से, सिर नीचे और पैर ऊपर कर के देखो। अब दिखा ना कि हमारा धर्म औरतों के खिलाफ नहीं। अपितु इसमें तो औरतों के लिए बहुत आज़ादी है। बुर्क़े का असली मक़सद तो फलां-फलां था।
फिर अब क्यों दुनिया भर में मुस्लिम औरतें बुर्का पहन रही हैं? इस पर वे कुछ नहीं कहते। हिन्दू भी दावा करते हैं कि हमारे हिंदू धर्म में तो औरतों का दर्ज़ा आदमी से ऊपर है।
ऊँचा दर्ज़ा मतलब चबूतरा। चलो, बैठो देवी बनकर चबूतरे पर। ज़्यादा खुलकर हँसो मत। याद रखो कि तुम देवी हो। तुम्हारे नाम के पीछे तो हमने गोत्र हटाकर देवी करवा दिया है। फिर भूल कैसे सकती हो।
मंगलसूत्र पहनने से लेकर, सिन्दूर लगाने और पति के पैर दबाने को सही ठहराने के लिए 'फ़र्ज़ी विज्ञान' और 'फ़र्ज़ी अध्यात्म' के फ़र्ज़ी तर्क आज यूट्यूब पर है। औरत के बजाए आदमी की बात होते ही जाने वह विज्ञान और अध्यात्म कहाँ गायब हो जाता है?
मैं नहीं कहता कि आप धर्म के खिलाफ जुलूस निकालें, या धर्म को त्याग दें। परंतु धर्म की क्या बात आपको माननी है, और क्या नहीं, इसके लिए दिमाग लगाने की आज़ादी भगवान ने भी आपको दी है, और संविधान ने भी। आपको अपनी ज़िंदगी में बदलाव के लिए दुनिया में बदलाव आने का इंतज़ार करने की कोई ज़रूरत नहीं।
बात केवल धर्म तक नहीं रह गई है। अच्छी बात है कि 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' मुहिम शुरू की गई। लेकिन एक पोस्टर पर यह लिख दिया जाता है कि बेटी बचाओ, नहीं तो घर में खाना कौन बनाएगी।
खैर, जाने दीजिए। यह तो साफ़-तौर पर बेहूदा बात हुई। बाकी समझदार लोगों की बात पर गौर किया जाए। लोग कहते हैं कि बेटी बचाओ क्योंकि
घर की शान होती हैं बेटियाँ।
पिता का मान होती हैं बेटियाँ।
इस तरह की हज़ारों कविताएँ हज़ारों स्कूलों में फंक्शन पर सुनाई जाती हैं, जिन्हें बच्चों के अभिभावक या अध्यापक तैयार करवाते हैं। ऐसी कविताओं को इनाम भी मिलता है। आप तालियाँ बजाते हैं।
और तालियाँ बजाते ही आप अनजाने में मनोज-बबली हत्याकांड पर अपनी मुहर लगा देते हैं। आप अदालत में मनोज की बहादुर माँ, उस मदर इंडिया के साथ खड़े होने के बजाए बबली के हत्यारे रिश्तेदारों के साथ खड़े हो जाते हैं।
ठीक है कि बबली के परिवार वाले उसके बॉयफ्रैंड के साथ भाग जाने को लेकर असहमत थे, तो उससे सभी रिश्ते-नाते तोड़ लेते। कभी उसको अपने घर में घुसने नहीं देते। लेकिन नहीं, पिता का मान होती हैं बेटियाँ। घर की शान होती हैं बेटियाँ।
बेटी ने घर से भागकर उनके मान पर कालिख पोत दी, और इस बात के आधार पर उसके परिवार वालों को उसकी हत्या करने का तर्क मिल गया।
बेटी बचाओ क्योंकि उसको लड़के जितना ही जीने का हक है, जो ऊपर वाली भगवान ने उसको दिया है। उनके जन्म लेने के लिए उन पर कोई अतिरिक्त शर्त लगाने वाले तुम होते कौन हो?
इस तरह औरत का दर्ज़ा आदमी के ऊपर होने का नाटक कर हमेशा उसे प्रताड़ित किया गया है। अब कह दीजिए कि औरतें देवियाँ नहीं होती। औरतें इंसान होती हैं। उनको जीने के हक के लिए या अपनी आज़ादी के लिए रानी लक्ष्मीबाई या कल्पना चावला होने की जरुरत नहीं है। राजस्थान के दूर-दराज़ गाँव के गरीब परिवार की लड़की जो शायद आंठवीं कक्षा के बाद पढ़ाई बंद कर देगी और माँ-बाप पर दहेज़ का बोझ बनेगी, उसे भी जीने का बराबर हक है। दहेज़ की समस्या उस लड़की की वजह से नहीं, दहेज़ माँगने वाले लालची लोगों की वजह से है।

Feminism in Hindi
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2. सनी लियोन सशक्त औरत का उदाहरण नहीं है।
यहाँ सनी की व्यैक्तिक ज़िन्दगी से मेरा कोई अभिप्राय नहीं। मैं उसके फ़िल्मी किरदारों की बात कर रहा हूँ। अगर वह फिल्मों में छोटे कपड़े पहनती है, तो किसलिए? या कहिए, किसके लिए? पुरुषों की विकृत मानसिकता को रिझाने के लिए ही।
जो स्वच्छंद मिजाज़ की तवायफों का नाचना पुरुष कोठे पर जाकर देखते थे, उसके लिए अब सिनेमा हॉल बन गए हैं। कभी पुरुषों को उनके खुले मिजाज़ से कोफ़्त नहीं होती थी। मर्यादा उन्हें घर में चाहिए थी। आज भी स्थिति वही है। सनी लियोन के प्रशंसकों में पुरुष ज़्यादा मिलेंगे, और औरतें कम।
बहुत से लोग मेरी बात का यह मतलब निकालने के लिए तत्पर होंगे कि औरतों को अपने हिसाब से कपड़े पहनने की आज़ादी नहीं होनी चाहिए। उससे पहले ही यह स्पष्ट कर दूँ कि
भले ही निक्कर पहनना आधुनिकता की निशानी नहीं है, परन्तु निक्कर पहनने की आज़ादी होना नारी सशक्तिकरण की पहचान ज़रूर है।
पुरुष गोवा के समुद्र में कच्छा पहनकर नहाते हैं, तो औरतें उन पर टूट नहीं पड़ती। इसलिए भगवान के लिए बलात्कार के लिए औरतों के कपड़ों को जिम्मेवार कहने की ओछी बात करना बंद कीजिए।
गाँव में भी बलात्कार होते हैं। छोटी बच्चियों को भी नहीं बख्शा जा रहा, और बूढी औरतों को भी नहीं। पुरुष अपनी आँखों में भरी अश्लीलता और दिमाग की विकृत सोच को ठीक करें। गुडगाँव वाली वायरल आंटी की तरह जो औरतें इस घटिया सोच का समर्थन करती हैं, वे भी अपनी सोच को बदलें।
खैर,वापस सनी की बात करें, तो वह औरतों के वस्तु बनाए जाने का प्रतीक है, नारी सशक्तिकरण का नहीं।
बहुत से फ़िल्मकार आजकल औरतों के मुद्दों पर बनने वाली हरेक फिल्म में औरत को शराब और सिगरेट पीते हुए दिखा रहे हैं। इससे पहले कि वे लोग फिर से कोई मतलब निकालने के लिए तत्पर हों, यह स्पष्ट कर दूँ कि -
सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। पुरुषों के लिए हानिकारक है, तो औरतों के लिए भी।
शराब या सिगरेट पीती हुई लड़की को चरित्रहीन करार देने का कोई अर्थ नहीं है।
लेकिन वैसे तो सिगरेट पीना शुरू करने का कोई वाजिब कारण नहीं दिखता, लेकिन किसी लड़की का आज़ाद महसूस करना सिगरेट पीना शुरू करने के लिए बहुत ही बकवास कारण है। फिर भी यह कारण आजकल बहुत आम बात हो गई है। इस पागलपन का आलम इस क़दर है कि कुछ लड़कियाँ तो पुरुषों के समकक्ष महसूस करने के लिए तथाकथित लड़कियों की सिगरेट को छोड़कर तथाकथित लड़कों की सिगरेट पी रही हैं। सोचिए ज़रा कि सिगरेट में भी पुलिंग-स्त्रीलिंग शुरू हो गया है।
जैसा कि मैंने कहा कि कुछ फिल्मकारों ने लड़कियों को बरगला दिया है। बार-बार नारी-केंद्रित मुद्दों पर बनने वाली फिल्मों में सशक्तिकरण के नाम पर केवल यही सब दिखाकर।
उन्होंने लड़कियों के आज़ादी के लिए विद्रोह को एक भटकी हुई दिशा दे दी है। शराब और सिगरेट पीना, शादी के बाहर चक्कर चलाना, पुरुषों की तरह गाली देना, हर बकवास बात में पुरुषों की होड़। बरेली की बर्फी में बिट्टी के सिगरेट पीने में मुझे ऐसा कुछ गलत नहीं लगता, यह उतना ही गलत है जितना बिट्टी के बॉयफ्रैंड और बाप का सिगरेट पीना, लेकिन "लिपस्टिक अंडर माई बुर्का" जैसी नारी-केंद्रित फिल्मों में इसे आज़ादी का चिन्ह बनाना बहुत भ्रामक है।
बहुत सी लड़कियों को मैंने गालियाँ देकर भी आधुनिक महसूस करते हुए देखा है।
एक फिल्म में तो औरतों का ज़ोर-ज़ोर से बाप-भाई की गालियाँ देने का दृश्य दिखाया गया है। इससे बेहूदा और क्या होगा। नहीं रुकिए, इससे ज़्यादा बेहूदगी आपको 'फोर मोर शॉट्स' में दिख जाएगी।
पुरुष-प्रधान फिल्म इंडस्ट्री में ऊपर उठकर अपने करियर को ऊँचाई पर ले जाने वाली प्रियंका चोपड़ा सशक्त महिला हैं। प्रियंका छोटे कपड़े पहनती हैं, उनकी मर्ज़ी। परंतु साड़ी पहनना भी पिछड़ेपन की निशानी नहीं है। साड़ी पहनने वाली और गुलाब गैंग शुरू करने वाली संपत पाल भी नारी सशक्तिकरण की प्रतीक हैं।
औरत का पढ़े-लिखे होना उसका सशक्तिकरण है।
जिस औरत का पति उसे पीट रहा है, और उसके माँ-बाप उसे एडजस्ट करने के लिए कहते हैं, उस औरत का कुछ काम-धंधा शुरू कर अलग से किराए के मकान में अपने बच्चों के साथ रहना सशक्तिकरण है।
किसी लड़की का अपनी शादी के लिए लड़का ढूँढना बेशर्मी नहीं, सशक्तिकरण है।
किसी औरत का बस कंडक्टर बनना या पैट्रोल पंप पर पैट्रोल भरने जैसा अप्रचलित काम करना सशक्तिकरण है।
कल्पना चावला और सुनीता विलियम्स ने लड़कियों को प्रेरित किया है।
60 साल से चल रही लिज़्ज़त पापड़ कोपरेटिव, जिसमें काम करने वाले सभी 43000 औरतें कर्मचारी नहीं, कंपनी की मालकिन हैं, वह मेरे लिए अत्यंत प्रेरणादायी है।
कौन दिखाएगा इन सब औरतों की कहानियाँ? बॉलीवुड की कलात्मक फिल्में इनकी शक्ति की बात कब करेंगी? क्या इसके लिए किसी औरत को पहले प्रसिद्द होना होगा?
अभी तक तो बात केवल शराब सिगरेट आदि गलत बातों में पुरुषों की होड़ करने की थी, लेकिन एक मुद्दा इससे कुछ हटकर है -
मुझे नहीं लगता कि औरत का नौकरी करना ही सशक्तिकरण है। हाँ, नौकरी करने की आज़ादी होना बिलकुल जरूरी है। लेकिन अगर मियां-बीवी दोनों की रज़ामंदी के चलते हुए अगर कोई औरत घर का काम कर रही है, और बच्चों का ध्यान रख रही है, तो उसके लिए भी मेरे दिल में बहुत सम्मान है।
ब्लूमबर्ग एजेंसी के अनुसार पूरी दुनिया का 75 प्रतिशत घरेलू काम औरतें करती हैं। चूल्हा-चौका करना भी एक काम है, और उसे भी किसी भी काम की तरह इज़्ज़त मिलनी चाहिए। बजाए कि औरतों की इज़्ज़त को स्थगित कर दें उस दिन के लिए जब भारत की सभी औरतें वर्किंग वुमन होंगी।
अगर इसके विपरीत पति घर का काम कर रहा है, और औरत नौकरी कर रही है, तब भी क्या समस्या है। जब पति-पत्नी में सहमति है, तो वह पुरुष क्यों किसी के लिए मज़ाक का पात्र है?
प्रसिद्द बॉक्सर मैरीकॉम ने अपने बेटों के नाम एक खुली चिट्ठी लिखी। इसमें उन्होंने कहा कि तुम्हारे पिता एक नौ से पाँच की नौकरी पर नहीं जाते, जिस तरह तुम्हारे मित्रों के पिता जाते हैं, क्योंकि हम दोनों में से कोई एक तुम्हारे पास होना चाहिए। तुम्हें जल्दी ही 'हाउस-हस्बैंड' शब्द सुनाई देगा, लेकिन याद रखना कि यह अपमानजनक नहीं है। वे मेरे जीवनसाथी हैं, मेरी ताकत हैं, जो मुझे मेरे हर कदम पर अग्रसर कर रहे हैं।
एक मित्र की पत्नी ने मुझसे कहा कि मैं सास-ससुर की नज़रों में इज़्ज़त पाने के लिए नौकरी करना चाहती हूँ। मेरी बेटी को तो कामवाली संभाल लेगी। मैंने उनसे कहा कि अगर आपका नौकरी करने का वाकई मन है, तो जरूर कीजिए। अगर कोई रोज़गार आपका ख्वाब है तो उसे पूरा कीजिए।
लेकिन नौकरी करना, पैसा कमाना, वर्किंग वुमन कहलाना, इसलिए कि आपको इज़्ज़त मिले, तो वह झूठी इज़्ज़त किसी काम की नहीं। यह इस औद्योगिक समाज की संकीर्ण सोच है कि पैसा कमाना ही घर में योगदान है। आपकी बेटी अभी बहुत छोटी है और आप पर निर्भर है। मेरे विचार में उसका ख्याल रखना कहीं ज़्यादा अच्छी बात है। इज़्ज़त मिलना आपका हक है। उसके लिए सास-ससुर की वाहियात शर्तों को क्यों मानती हैं आप? उनके सामने अपनी आवाज़ को बुलंद कीजिए।
जिस तरह रूढ़िवादियों ने लड़की के जीने के हक के लिए पिता का मान बढ़ाने की शर्तें लगा दी, तो वहीं आंदोलनकारियों ने औरत की आज़ादी के लिए एक शर्तों से भरा हुआ चित्र बना दिया। एक तो यह चित्र ही भ्रामक बातों से भरा हुआ है, और दूसरी बात यह कि शर्तें क्यों हो? क्या पुरुषों की आज़ादी के लिए कोई शर्तें होती हैं? इसलिए ऐसा कीजिए कि इस चित्र को फाड़कर फेंक दीजिए।
सशक्तिकरण होगा पढ़-लिखकर, अपनी आवाज़ को बुलंद कर, खुलकर हँसकर और अपने पैरों पर खड़े होने की क्षमता बनाकर। आज़ादी हर बात की, पर इज़्ज़त हर हाल में।
3. औरत की आज़ादी का आंदोलन पुरुषों के ख़िलाफ़ नहीं होना चाहिए।
मुझे फेमिनिज़्म से कोई समस्या नहीं, लेकिन आजकल फेमिनिस्ट का तमगा लिए हुए घूमने वाली बहुत सी औरतों से गुरेज़ है। ये "कट्टर" फेमिनिस्ट आपको दिखाना चाहेंगी कि टक्कर औरत बनाम पुरुष है।
लेकिन यह सच नहीं। टक्कर रूढ़िवादी आदमी-औरतों और उदारवादी आदमी-औरतों के बीच है। बहुत सी महिलाएँ रूढ़िवादिता की समर्थक हैं। उनका ऐसा होना भी स्वाभाविक है, क्योंकि वे अपनी बहू को और खुद को दो औरतों की तरह नहीं देखती। वे उन दोनों को सास-बहू के रूप में ही देखती हैं। इसलिए यह कहना बकवास है कि औरत औरत की दुश्मन है। कोई भी दो लोग गली में लड़ रहे होंगे, तो आप यह तो नहीं कहेंगे ना कि भारतीय भारतीय का दुश्मन है। ब्राज़ील में जाकर आदमी खुद को भारतीय के रूप में देखता है, अपनी गली के पड़ोसी के आगे नहीं।
इसलिए जो औरत हमेशा पितृसत्तात्मक समाज में रही, उसका अपनी बेटी पर रोक लगाना कोई हैरत की बात नहीं।
उसका अपने बेटे से रोने का अधिकार छीन लेना कोई बड़ी बात नहीं।
उसका अपनी बेटी की ऑनर किलिंग में लिप्त होना भी देखा गया है।
इसलिए उदारवादी आदमी और औरतों को इकट्ठे मिलकर लड़ना होगा। किसी औरत का अपनी आज़ादी के लिए आवाज़ उठाने के केवल आदमी पर ही आश्रित होना भी गलत है, लेकिन आज़ादी की आवाज़ आदमी के बजाए रूढ़िवादी सोच के खिलाफ होनी चाहिए।
अपनी बेटियों और अगली पीढ़ी के लिए हमें मिलकर संघर्ष करना होगा। रूढ़िवादी लोगों की बेटियों और बेटों के लिए भी हमें ही लड़ना होगा। हम उन्हें उनके निर्दयी माँ-बाप के चंगुल में नहीं छोड़ सकते।
हमें मी-टू (MeToo) के आरोपियों के खिलाफ मिलकर आवाज़ उठानी होगी, तो इस आंदोलन का फायदा लेकर किसी पुरुष पर झूठे आरोप लगाकर अपनी ज़्यादती दुश्मनी निकालने वाली औरतों के खिलाफ भी इकट्ठे हल्ला बोलना होगा।
तलाक के लगभग हरेक मुकदमे में अपनी महिला मुव्वकिल के पक्ष को मजबूत बनाने के लिए घरेलू हिंसा की 498A धारा के तहत झूठा मुक़दमा चलवाने वाले वकीलों के खिलाफ विरोध करना होगा।
यह समझना होगा कि आंदोलन केवल औरतों के अधिकारों के लिए नहीं है। यह उन सब लड़कों के लिए भी है, जिनको बचपन से रोने नहीं दिया गया। जिनको अंदर से कठोर बना दिया गया। जिन्हें दोस्तों के आगे खुलकर अपना दुःख ज़ाहिर करने के लिए शर्मिंदा महसूस करवाया जाता है। जो 'मर्द' होकर मनोवैज्ञानिक की मदद लेना शर्म का विषय मानते हैं। जिनके लिए 'ख़ामोशी में तड़पना' जैसा मुहावरा बना दिया गया है।
आपको यह बता दूँ कि रूढ़िवादी आदमी और औरतों में बहुत गहरी एकता है। आजकल सब जगह इसका नज़राना मिलता है। उदारवादी आदमी और औरतों को इस लड़ाई की वैचारिकता को समझकर इकट्ठे होना होगा।
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4. शॉपिंग करने के अलावा भी औरतों की कुछ रुचि हो सकती हैं।
एक पुराने ज़माने की रूढ़िवादी कंडीशनिंग थी, जिसको आसानी से देखा जा सकता था। लेकिन पिछले 50 साल में एक आधुनिक कंडीशनिंग आई है, जिसको टीवी धारावाहिकों, विज्ञापनों और फिल्मों के ज़रिए लड़कियों की नसों में इंजेक्शन की तरह लगाया जा रहा है।
औरतें एक्शन फिल्में नहीं देखती।
औरतों को क्रिकेट या फुटबॉल में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं होती।
उनका पसंदीदा रंग गुलाबी होता है।
उनकी हॉबी शॉपिंग होती है।
उनकी राजनीति में कोई रुचि नहीं होती।
हर लड़की का सपना कि उसका राजकुमार उसे घोड़े पर लेने आएगा।
लड़की कभी लड़के को प्यार का इज़हार नहीं करती।
लड़की को पसंद है - सजना है मुझे सजना के लिए।
लड़कियाँ बॉयफ्रैंड से टाइम माँगने के लिए उनका सिर खाती रहती है।
लड़की बॉयफ्रैंड से उपहार की कामना करती है।
लड़कियों को खून दिखते ही चक्कर आने लगते हैं।( मुझे भी खून देख कर चक्कर आता है मई अल्द्की तो नहीं हो गया न )
लड़कियों को मंदिर जाना बहुत अच्छा लगता है। जब वे आँखें बंद कर प्रार्थना करेंगी, तब बॉयफ्रैंड उन्हें देखेगा।
लड़कियों को रोबीले लड़के पसंद होते हैं।
औरतों को अखबार पढ़ना उब्काऊ काम लगता है।
आदमी अखबार पढ़ रहा है, और औरत चाय बना रही है। फिर वह कहती है कि अजी, छोड़ो ना इस अखबार को।
सभी लड़कियों की बात नहीं, लेकिन यह सब अब पूर्णतया झूठ नहीं रहा। करोड़ों लड़कियाँ एक ही तरह से व्यवहार करने लगी हैं। प्यार का पंचनामा फिल्म में जो दिखाया गया है, वाकई वह बहुत सी लड़कियों पर सच साबित होता है। यहाँ उन लड़कियों के धोखा देने की बात नहीं कर रहा हूँ, बल्कि उन किरदारों के व्यक्तित्व की बारीकियों की बात कर रहा हूँ।
जैसे नारी-केंद्रित फिल्मों में सशक्त महिला का एक चित्र बनाया गया है, ऐसे ही बाकी फिल्मों और यूट्यूब वीडियो से आम लड़की का एक चित्र बना दिया गया है। हिंदूकरण, इस्लामीकरण की तरह अब यह स्त्रीकरण नाम की एक चीज़ है। इसी तरह एक चित्र लड़कों के लिए बना दिया गया है,
लड़कों को बुलेट मोटरसाइकिल चलाना पसंद है। यह हरेक लड़के का सपना होना चाहिए। उसके साइलेंसर में छेद करवा के पटाखे फोड़ना बहुत कूल है। 
जो लड़का ज़्यादा दारू पी सकता है, वह ज़्यादा मर्दाना है।
दारू पीकर गाड़ी तेरा भाई चलाएगा।
पुलिस से पंगा लेना बहुत बहादुरी का काम है।
असली लड़का वह है जो गर्लफ्रैंड से ऊपर दोस्तों को रखे।
रेस्त्रां में खाना खाकर बिना रुपए दिए भाग जाना बहुत मस्तीपूर्ण होता है।
लड़कों का गुलाबी या मजेंटा रंग की शर्ट पहनना शर्म का विषय है। छोटे बच्चे को भी माँ-बाप लड़कों वाले रंग का पैन, नोटबुक दिलवाएँगे।
लड़कों का चिकनी मिट्टी से क्ले मॉडलिंग करना - पागल है क्या?
भाई, बैंगकॉक कब चल रहे हैं हम? दोस्त के पूछने पर अगर किसी ने कहा कि मुझे वेश्या के पास तो जाना नहीं है, इसलिए मॉरिशस चल सकते हैं, तो वह फुद्दू है।
बहुत सारी लड़कियाँ आपसे लिपट जाएँगी, हरेक लड़के की यही फैंटसी होनी चाहिए। इसलिए यह इत्र लगाइए।
छि.छि., लड़कियों वाली क्रीम लगा रहे हो। ये नहीं, मर्दाना क्रीम लगाओ।
सभी लड़कियाँ और लड़के मानते हैं कि यह सब उनका अपना व्यक्तित्व है। यह सब उनकी पसंद है। लेकिन क्या यह कुछ ज़्यादा ही संयोग नहीं है कि सभी लड़कियों को ही शॉपिंग करना पसंद हो।
इस कंडीशनिंग को पहचानना होगा, इसके बारे में सजग होना होगा, ताकि इसे हटाया जा सके। यह रूढ़िवादिता की स्पष्ट दिखने वाली दीवार के जैसी नहीं है। यह एक अदृश्य क़ैद है, जिसमें आपको बता दिया गया है कि आपको कैसा बनना है। यहाँ चुनौती खुद से लड़ने पर आ जाती है।
आज अखबार पढ़कर देख लेती हूँ। आज अपने फेवरेट गानों को छोड़कर कुछ नया सुनता हूँ। हर बात में हमें खुद को विखंडित कर के देखना होगा। अपना पुनर्निर्माण करना होगा। ताकि हम पितृसत्तात्मकता के नए मॉडल में धकेले जाने से बच पाएँ।
5. जरूरी नहीं कि शादी के वक़्त लड़के की तंख्वाह ही ज़्यादा हो।
नारी सशक्तिकरण की बात करते हुए हमेशा अधिकारों की बात होती रही है। लेकिन नई जिम्मेवारियाँ लेने की बात कोई नहीं करता। ना ही रूढ़िवादी लोग और ना ही फेमिनिस्ट। यह "लेडीज़ फर्स्ट" उसी देवीकरण का दूसरा रूप है।
एक लड़की  समस्या है ।  उसकी मम्मी   हर वक़्त पीछे लगी रहती है। उसे कॉलेज भी खुद छोड़ने जाती हैं। इस लड़की का स्कूल अपने घर से मात्र सात सौ मीटर की दूरी पर था। लेकिन बारह्वीं कक्षा तक भी यह साइकिल अथवा पैदल जाने के बजाए अपनी मम्मी के साथ कार में स्कूल जाती रही। बहुत से लड़के तो इसे शर्म का विषय मानेंगे कि माँ-बाप उन्हें छोड़ने आते हैं, तो वहीं बहुत से माँ-बाप भी लड़के को कहेंगे कि बस इतनी दूर जाने के लिए तुझे माँ-बाप चाहिए, पागल है क्या? लेकिन वह लड़की माँ-बाप के इस रक्षात्मक व्यवहार को सुविधा मानकर इसका उपभोग करती रही। स्कूल ही नहीं, कॉलेज के प्रथम वर्ष तक भी। लेकिन अब उसका बॉयफ्रैंड बन गया है, तो उसे अपनी मम्मी का यह व्यवहार अजीब लगने लगा है।
घर में जवान बेटा हो तो लोग अपने माँ-बाप, यानि लड़के के दादा-दादी को लड़के के हवाले सौंपकर चिंतामुक्त होकर घूमने चले जाते हैं। कुछ दिक्कत हुई, तो लड़का हॉस्पिटल ले जाएगा। कार नहीं भी होगी, तो टैक्सी कर के ले जाएगा। कुछ ना कुछ तो कर ही लेगा। लेकिन वह लड़की जो अपनी कोचिंग पर जाने के लिए ही भाई पर आश्रित है, वह माँ-बाप को कैसे कहेगी कि आप जाओ, मैं दादा-दादी का ख्याल रख लूँगी।
सेल्फ-सर्विस रेस्त्रां में जाते हैं, तो पत्नी आराम से बैठ जाती है। पति ऑर्डर देने और खाना लेने जाता है।
औरत कार चलाना जानती है, लेकिन जब पति कार चला रहा है, तो ज़हमत क्यों उठानी?
कहीं घूमने जाएँगे, तो औरत चिंतारहित खड़ी है। होटल ढूँढना, कमरा बुक करना, वहाँ से अगली बस या टैक्सी पता करना - सब पति कर लेगा।
बॉयफ्रैंड और गर्लफ्रैंड दोनों ही लोग कमाते नहीं, लेकिन रेस्त्रां का बिल बॉयफ्रैंड भरेगा।
उसका आगे बढ़कर दरवाज़ा खोलना, कुर्सी हटाना बहुत जेंटलमैन वाली बात मानी जाती है। लड़की कितना खुश हो जाती है ना। क्यों, उसके खुद के हाथों में मेहंदी लगी है क्या?
मैट्रो में महिलाओं के लिए सीट आरक्षित होना सही है, क्योंकि कुछ छिछोरे जवान एवं बूढ़े लोग भीड़ में गलत हरकतें करते हैं। लेकिन जब भीड़ ना हो, तो क्या किसी लड़की को अपनी सीट किसी वृद्ध नागरिक के लिए नहीं छोड़ देनी चाहिए? कुछ लड़कियाँ ऐसा करती भी हैं, जो कि बहुत अच्छी बात है। लेकिन आमतौर पर लड़की मान लेती है कि कोई लड़का उन्हें अपनी सीट दे देगा।
इसके कितने कम उदाहरण देखने को मिलते हैं कि पत्नी पति से ज़्यादा कमाती हो। क्योंकि अरेंज मैरिज में लड़कियाँ खुद इस बात का विशेष ध्यान रखती हैं कि अपने से ज़्यादा कमाने वाले लड़के से ही शादी करें।
यह बात कितनी आम हो गई है कि लड़कियों को तो अमीर लड़के पसंद आते हैं। कहना चाहता हूँ कि यह झूठ है। लेकिन यह पूर्णतया झूठ लगता नहीं। अमीर लड़का गरीब लड़की को भी गर्लफ्रैंड बना लेता है, लेकिन अमीर लड़की का गरीब बॉयफ्रैंड होना बहुत कम देखा गया है।
लड़कियाँ बॉयफ्रैंड द्वारा उपहार मिलने को अपना अधिकार मान लेती हैं। चाहती हैं कि बॉयफ्रैंड उन्हें पलकों पर रखे, यानि पैमपर करे। इस तरह वे बॉयफ्रैंड को अधिकार देती रहती हैं कि वह उन्हें अपनी मिलकियत समझे। ये कबीर सिंह फिल्म की नायिका प्रीति जैसी लड़कियाँ होती हैं। फिर इन्हें बाद में शिकायत होती है कि बॉयफ्रैंड उन पर धौंस जमा रहा है। क्या लड़की कभी वैलेंटाइन डे या बॉयफ्रैंड के जन्मदिन पर उसे सरप्राइज़ नहीं दे सकती, या बड़ा सा उपहार नहीं दे सकती।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि औरतें भी तो घर के काम करती हैं। लेकिन फ़र्क़ यह है कि आजकल अखबारों में लेख छप रहे हैं कि माँ अपने बेटे को भी खाना बनाना सिखाए। आजकल घर के काम के लिए कामवाली भी लगाई जा रही है। लेकिन जिन अमीर परिवारों में घर का सारा काम कामवाली करती है, वहाँ भी बाहर के काम आदमी ही करते हैं। उन पढ़ी-लिखी, कार चलाने वाली, फैशनेबल औरतों का काम फिल्मों में किटी पार्टी जाना दिखाया गया है।
रूढ़िवादी लोग कभी औरतों को उपर्युक्त जिम्मेवारी उठाने के लिए नहीं कहेंगे। पुरुष रेस्त्रां का बिल ख़ुशी से खुद भरेंगे। सास बहू को अकेले बाहर जाकर किचन का सामान खरीदने के लिए नहीं कहेगी। रूढ़िवादी लड़कों को अपने से ज़्यादा तंख्वाह वाली लड़की से शादी करने में सख्त ऐतराज़ होगा।
क्योंकि यही 'लेडीज़ फर्स्ट' ही तो उनका त्रुप का इक्का है। अगर औरतें यूँ आत्म-सम्मान से भरने लगी, इन कामों के लिए पुरुषों पर निर्भर होना छोड़ दिया, अगर खुद अपने निर्णय लेना सीख लिया, तब तो वे हाथ से निकल जाएँगी।
फिर से वही बात कह दूँ कि अगर किसी मियां-बीवी के बीच यह घर के काम और बाहर के काम का विभाजन रज़ामंदी से है, तो अच्छी बात है।
लेकिन लड़कियों को मेरे दोस्त की स्वघोषित फेमिनिस्ट गर्लफ्रैंड जैसा बनना बंद करना होगा। जब चार फ्लोर नीचे उतरकर दूध लेकर आना होता, तो वह छुई-मुई बन जाती, और दूध उसका शोना बाबू लेकर आता। लेकिन जब चाय बनाने की बात आती, तो उसके हृदय से फेमिनिज़्म का ज्वाला फूटने लगता। खैर, मेरा दोस्त भगवान की दया से अभी किसी और लड़की के साथ सुखद दांपत्य जीवन व्यतीत कर रहा है।
केवल अधिकार मिलना नहीं, जिम्मेवारी उठाना भी सशक्तिकरण की एक सीढ़ी है।
बहुत से रूढ़िवादियों और नारीवादियों को बहुत सी बातें बुरी लगी होंगी। उसके लिए कोई माफ़ी की गुज़ारिश नहीं। आपकी भावनाओं को मद्देनज़र रखते हुए मैं अपनी बात कहना बंद नहीं कर सकता। हाँ, टिप्पणी में अपना मतभेद ज़ाहिर करने के लिए आपका स्वागत है।


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