UA-149348414-1 why bhagat is differ from other revolutionary?- भगत सिंह दूसरे क्रांतिकारियों से अलग क्यों है ?

why bhagat is differ from other revolutionary?- भगत सिंह दूसरे क्रांतिकारियों से अलग क्यों है ?

जन्म-28 सितम्बर ,1907
शहीद-23 मार्च ,1931
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BHAGAT SINGH

जब कभी भी दुनिया के किसी कोने में, किसी भी महाद्विप के किसी भी देश में सत्ताधारी ताकतें अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल करने लगती है,जिससे जनता में असंतोष का भाव उतपन्न हो ,तब वहां पर क्रान्ति की शुरुआत होती है। यह क्रान्ति तब तक जारी रहती है जब तक की वो घमंडी सत्ता पाताल में न समा जाए। अगर यह देखा जाए तो ऐसा धरती का कोई कोना नहीं है जहां पर इस क्रान्ति का बीज ना बोया गया हो। यही बात सिद्ध करती है कि सत्ताधारी ताकते अपने आप में चाहे कितना भी मजबूत हो अगर वो गलत के पक्ष में है जबकि जनता सही के पक्ष में न्याय के लिए आवाज उठाते हुए जंग का एलान करे तो जीत हमेशा सत्य की ही होती है।अंततः वहां लोकतंत्र की स्थापना होती है।

                                                                      "सत्यमेव जयते"

विश्व इतिहास पर अगर नज़र डालें तो लिखित और व्यापक रूप में पहली बार जनता सत्ता के खिलाफ एकजूट हुयी सन 1688 में। देश था इंग्लैण्ड।लगभग एक साल के संघर्ष के बाद वहां राजा के अधिकारों को सिमित कर दिया गया। संसद को शक्तिशाली बनाया गया। इस तरह से जेम्स द्वितीय की सत्ता का अंत हुआ। इंग्लैंड सम्भवतः पहला देश बना जहां राजतंत्र को खत्म करके लोकतंत्र की स्थापना हुयी।फिर संसद को तानाशाह बनने से रोकने के लिए मौखिक संविधान की भी स्थापना हुई। इस तरह से इंग्लैंड लोकतंत्र और संविधानिक शाशन का जनक बना।
         सबसे पहले सामाजिक समानता के लिए जागरूक होने का नतीजा ये हुआ की इंग्लैंड 18वीं सदी का सबसे ताकतवर देश बनकर उभरा। इंग्लैण्ड ने अपनी आय और उत्पादन की वृद्धि के लिए कमजोर और बदहाल जो सामाजिक रूप से जागरूक ना हो और जो अपने आप में बटे हुए थे(धर्म,जाती,स्थान के नाम पर),उनको अपना उपनिवेश बनाना शुरू किया। इसका परिणाम इंग्लैण्ड के लिए साकारात्मक था लेकिन उपनिवेश में रहने वाले लोगों के लिए नाकारात्मक। यही कारण था की विश्व भर में अनेक क्रांतियां हुयी जिनमे से अधिकांशतः , इंग्लैंड के अत्याचारों से उत्पन्न हुयी थी। उन अत्याचारों से उभार पाने वालों में एक देश अमेरिका भी था । जिसने लोकतंत्र की एक मिशाल पेश की और दुनिया को पहला लिखित संविधान दिया।जो 20वीं सदी में एक महाशक्ति बनकर उभरा। इन तमाम क्रांतियों और क्रांतिकारियों में कोई न कोई एक ऐसा व्यक्ति था जो बाकी क्रांतिकारियों के लिए एक आदर्श बनकर उभरा। जिसके विचारों ने दुनिया भर के क्रांतिकारियों को प्रेरित किया।                                                                                                मार्क्स,लेनिन,वाशिंनगटन,लिंकन,खलील जिब्रान और दुनिया भर की शख्सियतों को मैंने  पढ़ा और उनके सामजिक विचारों पर तार्किक रूप से सहमत भी हुआ। लेकिन जो प्रभाव भगत सिंह का मुझ पर रहा है,किसी और का नहीं है।
                                                       जिस समय भगत सिंह का जन्म हुआ क्रान्ति की आग हिंदुस्तान में लग चुकी थी। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को हुए 50 वर्ष बीत चुके थे। 1857 से पहले भी अंग्रेजों और भारतीयों में संघर्ष जारी था। जिनमे दक्षिण भारत में शेर-ए-मैसूर टीपू सुलतान और उत्तर भारत में झांसी की रानी लक्ष्मी बाई मुझ पर विशेष रूप से प्रभावी है। ऐसा कह कर मैं यह नहीं कहना चाहता की मैं उन 70 लाख आज़ादी के परवानों के ऊपर प्रश्नचिन्ह लगा रहा हूँ जिन्होने इस देश और समाज के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर किया। आज मैं ये लेख लिख रहा हूँ और आप इसे पढ़ पा रहे है ये उन 70 लाख लोगो के खून और पसीने की देंन है।और ये बिलकुल झूठ है कि आज़ादी बिना खून बहाये चरखे के बल पर मिल गयी। जो ऐसा बोलते और गाते है कि साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल ।।दे दी हमें आज़ादी बिना जंग बिना ढाल।मुझे ठीक से याद नही मैं ऐसा बकवास याद करना नहीं चाहता ,लेकिन वो गीत जो राष्ट्रीय पर्वो पर अक्सर गाया जाता है इससे मिलता जुलता ही है। ऐसा लिखने और गाने वाले लोग जाहिल होते हैं। मैं एक बार उनसे कहता हूँ की वो जलियावाला बाग़ घूम कर आये फिर ये बाते बोले। अगर तब भी ऐसी बाते करते है तो वो मानसिक रूप से बीमार है। हमे आज़ादी युही नहीं मिली ।खून बहा है और बहुत बहा है। खून जिनका बहा वो भी हमारी तरह इंसान ही थे। मंगल पांडे, खुदीराम्बोस,टीपू सुलतान,चन्द्र शेखर आज़ाद, भगत सिंह ,अश्फॉक उल्ला खान, राम प्रसाद बिस्मिल,रानी लक्ष्मीबाई,तात्या टोपे आदि नाम है जो सिद्घ करते है आज़ादी सिर्फ चरखे और नमक कानून तोड़ने से ही नहिं  मिल गयी।हालांकि भारतीय क्रांति के इतिहास में गांधी जी के योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता केवल कुछ मुद्दों पर सवाल उठाया जाया  सकता है।
                                                                  1857  से पहले जो भी भारतीय संघर्ष था वो अपना राज्य अंग्रेज़ो से बचाने के लिए ही था। फिर भी वो एक सराहनीय कदम था,क्योकि उसी दौर से ही कुछ राजा अंग्रेज़ो के तलवे चाटना शुरू कर चुके थे और उनके बीच जो अपने सम्मान के लिए अंग्रेज़ो से आखरी सांस तक लड़े वो भी हमारे आदर्श है। देश चाहकर भी उनके वीरता को  भुला नहिं सकता, क्योंकि कल जिसका बाप मरा हो और आज वो उस उम्र जिसमे उसे सुल्तानों का जीवन जीते हुए आनन्द लेना चाहिए था जैसा कुछ राजाओं ने अंग्रेज़ो के तलवे चाटते हुई आनंद में जीवन जिया  ,उसी उम्र में टीपू सुल्तान जंग की मैदान में खड़ा था और एक बेटे और एक नायक राजा होने का फर्ज निभा रहा था और आखरी सांस तक वो अंग्रेज़ो से लोहा लेता रहा।जिस रानी को एक विधवा होते हुए जीवन बिता देना चाहिए था उस रानी ने अपनी आखरी सांस जंग की मैदान में ली।सर का दायां हिस्सा कट जाने और एक आँख घायल होने के बाद भी,पीठ पर अपने बेटे को लिए हुए दोनों हाथों से तलवार भाजति हुयी जंग की वीरांगना होने का परिचय देते रही। अंततः अन्याय और न्याय के जंग में वो शहीद हो गयी। वो पूरी दुनिया के नारियों के साहस का आज भी प्रतीक है। ये 1857 से पहले के अंग्रेज़ो और भारतीयों के संघर्ष में बहते खून की बस 2 उदाहरण है। मैं भगत सिंह के बारे में बोलने से पहले इसलिए ये बोल रहा हूं क्योंकि मैं उन लोगो के दिमाग से पहले भ्र्म निकालना चाहता हूँ जो इस स्वप्न में डूबे है कि आज़ादी सिर्फ चाटुकारिता के शब्दो और खोखले भाषणों से मिल गयी।
                                                अब बात करते हैं भगत सिंह की,,,,
1857 के संग्राम में पहली बार भारतीयों की एकता दिखी। जो लोग अलग अलग लड़ते थे अब एकजूट हो रहे थे। राष्ट्रवाद प्रबल हो रहा था। राष्ट्रीय एकता की जरूरत महसूस होने लगी। इसी सम्बन्ध में एक कदम उठाया गया और 1885 में कांग्रेस का गठन हुआ।जो एक समिति के रूप में कार्य करति थी । अंग्रेज़ो के नीतियों का विश्लेषण करती थी।लेकिन उसका प्रारम्भिक उद्देश्य आज़ादी नहीं था। लेकिन धीरे धीरे आज़ादी उसका मुख्य उद्देश्य बन गया। तमाम नए नेता जुड़ने लगे और कांग्रेस संगठित और मजबूत होती चली गयी। धीरे धीरे यह अंग्रेज़ो और भारतीयों के बीच एक पूल की तरह काम करने लगी। एक ऐसा माध्यंम जिससे अंग्रेज़ अपनी बात भारतियो तक और भारतीय नेता अंग्रेज़ो तक अपनी बात पहुंचाने लगे।ये नेता उदारवादी और अहिंसावादी थे। जिनमें सबसे ऊपर नाम महात्मा गांधी का था। भगत सिंह के बालकाल के समय ये हिंदुस्तान ही नही दुनिया भर में प्रसिद्ध हो चुके थे।भारतीयों के सबसे बड़े नेता के रूप में जाने जाते थे।ये भी उदारवादी और अहिंसावादी थे। उदारवादी शब्द पर मैं चुप रहूंगा लेकिन अहिंसावादी होने पर एक सवाल मेरे मन में आता है कि इन्हें अंग्रेज़ो की हिंसा क्यों नही दिखती थी?महात्मा बुद्ध के अहिंसा के सिद्धांत से मैं सहमत हूं । लेकिन गांधी जी  के सिद्धांत पर  मेरे  कुछ  सवाल बाधक बनते  हैं  क्योकि जब अँगरेज़ भारतीय महिलाएं जो आज़ादी के जंग में शामिल थी उन्हें जेल में डालते और बलात्कार जैसा घिनौना कृत्य तक करते। जलियावाला बाग़ में गोलियों से भूनते थे। कोड़े से पीटते थे।अत्याचार पे अत्याचार करते थे। तब ये सिद्धान्त कहां थे? भगत सिंह जब बाल्यकाल में थे तमाम भारतीयों की तरह उनको भी महात्मा गांधी में अटूट विश्वास था।रौलेट एक्ट सम्बन्धी आंदोलनों की सफलता ने महात्मा गांधी को एक राष्ट्रीय नेता के रूप में पहचान दिला दी थी। 1914 से 1918 के बीच विश्व युद्ध के दौरान भारतीय प्रेसों की स्वतंत्रता खत्म कर दी गयी और जबरन किसी को भी कारावास में बंद किया जा सकने का अधिकार सम्बन्धी क़ानून बना दिया गया। 1 अगस्त 1920 को महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन शुरू किया। पूरा देश खासा उत्साहित था क्योंकि गांधी जी ने कहा था कि अगर हम अंग्रजो का सहयोग नहीं करेंगे तो अँगरेज़ 2,,3 सालो में आजिज आकर देश छोड़ कर चले जायेंगे। गांधी और कांग्रस के नेताओं पर करोङो भारतीयों का अटूट विश्वास था। ऊनमे भगत सिंह भी थे। वो भी अपने बालमन में स्वतंत्र भारत के सपने देखने लगे थे। लेकिन जब ज़िंदगी का मुस्तकबिल कुछ और ही हो तो सपने टूटते है और बिखर जाते है और नए सपनो की नींव पड़ती है।
 ऐसा ही हुआ 5 फरवरी 1922 को चौरी चौरा काण्ड जिसमे एक पुलिस स्टेशन में क्रांतिकारियों ने सभा की भीड़ पर गोली चलाने के बदले में आग लगा दी। इस आग में 22 पुलिस वाले जल कर मर गए। गांधी जी ने कहा भारतीय हिंसक हो चुके हैं और शोक जताते हुए असयोग आंदोलन वापस ले लिया।बेशक यह मानवीय तौर पर सोचा जाए तो एक अप्रिय घटना है। लेकिन सवाल यह भी है कि 13 अप्रैल 1919 को जलियाँ वाला बाग़ में क्या हुआ था? क्या वो अमानवीय और हिंसक नहीं था?क्या वह कांग्रेस की या ब्रिटिश सरकार की जवाबदेही नहीं थी? क्यों किसी को इतना हक है कि गोलियों से किसी को भुने और खून पर खून बहाता रहे?भले ही इतिहासकार कांग्रेस और ऐसे खोखले आंदोलनों से जुड़े लोगों को इसका जिम्मेदार न ठहराते हो,इल्जामात का सारा काला चिट्ठा ब्रिटिश सरकार पर ही फोड़ते हो। लेकिन फिर भी मैं उन लोगों में से हूँ जो इन सबका जिम्मेदार कांग्रेस और इन जैसी मतलबपरस्त पार्टीयो को ठहराते हैं। आप सोचते होंगे ये क्या पागलपन है!? पर ये सही बात है जिस जालिम सत्ता को उखाड़ फेंकने की आप कोशिश में लगे हों, आप जिसके खिलाफ साम्यवाद,समाजवाद,स्वराज जैसे दावे करते हो,जिसके जुल्मो के खिलाफ आप लड़ रहे हों,उसी सत्ता के साथ आप चाय की टेबल पर बैठ कर बात करे। ये क्रान्ति का नियम नहीं। क्रान्ति का नियम है आप हमें अपनी आज़ादी दीजिये तब हम आपको गले भी लगाएंगे और साथ चाय भी पिएंगे।अगर ऐसा नही है तो सिर्फ बगावत ही एक मात्र रास्ता है। और कोई दूसरा रास्ता सिर्फ और सिर्फ चमचागिरी है।जो कांग्रेस के बाद संगठित होने वाली बड़ी पार्टीयों हिन्दू महासभा,मूस्लिम लीग ने बखूबी किया। मुझे पता है आपको अब भी यकीन नहीं होगा इन बातों पर ,तो साहब एक काम करिये भारतीय इतिहास पढ़िए और मेरे कुछ सवालों का जवाब दे दीजिए। क्यों उम्रकैद की सजा मिलने के बाद भी नरम दल के नेता फिर से बरी कर दिए जाते थे ?जबकि क्रांतिकारियों के साथ एक बार भी ऐसा नही हुआ  की उनकी सजा माफ़ की गयी हो। मैं बताता हूँ क्यों,,,क्योकि चाहे कितना भी लालच दिया गया और कितने भी शारीरिक और मानसिक कष्ट दिए गए फिर भी उनका मकसद सिर्फ और सिर्फ इंकलाब ही था,वो कभी अपने लोगो और अपने मुल्क से दगा नहीं किये। अंततः उनका अंत फांसी के फंदे पर ही होता था।नरम दल के नेताओ का एक मकसद यह भी था कि देश में सत्ता हो अपनी और सरकार हम हो। बस यही लालच उनको ज़िंदा रखा। लालच में वो अंग्रेज़ो की चमचागिरी करते थे। इनमें सिर्फ कांग्रेस ही नहीं बल्कि हिंदुमहासभा(RSS),मुस्लिम लीग के भी लोग शामील थे।
जब गांधी जी ने अचानक असहयोग आंदोलन को बंद किया तो इसका प्रभाव समूचे भारत और इसके स्वतंत्रता आंदोलन पर पड़ा। गरम खून के मालिक युवाओं को लगने लगा था कि आजादी सिर्फ जन सभाओं और खोखले भाषणों से नहीं मिल सकता। आजादी खून माँगती है और उसे खून देना ही होगा। इन युवाओं में चन्द्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल,अश्फॉक उल्ला खां,राज गुरु, जतिनदास,सुखदेव,करतार सिंह सराबा, खुदि राम बोस, भगत सिंह जैसे(सभी क्रांतिकारियों का नाम का उल्लेख करना यहाँ मुश्किल है अतः माफ़ी चाहता हूँ) तमाम क्रांतिकारी थे जो अपने जीवन को कर्तव्य एवं न्याय के नाम पर न्योछावर कर दिया और यह सिद्ध किया कि मानव धर्म श्रेष्ठ है। हम सभी शहीदो एवं क्रांतिकारियों का तहे दिल से आभार प्रकट करते हैं और उनका आदर करते हैं क्योंकि पूरा हिंदुस्तान उनके बलिदानों का ऋणी है। मैं यह लेख लिख पा रहा हूँ और आप इसे पढ़ पा रहे हैं यह अधिकार इनके जीवन के बलिदान की ही देन है।
                                                                             फिर भी मैं अधिकार से कहना चाहता हूँ की भगत सिंह का भारतीय क्रांतिकारी इतिहास में होना जरूरी था, कारण निम्न है- और यह कारण सिद्ध करेगा की हमें क्यों भगत सिंह बाकी  क्रांतिकारियों  से  अलग  थे ?----
                                       भारतीय क्रांतिकारी गरम दल के सिद्धांतों की नींव खून के बदले खून के नियम पर रखी थी। क्रांतिकारियों की यही भावना थी की अँगरेज़ हमे मारते है तो हम अंग्रेज़ो को मारेंगे।जिसका नतीजा यह था कि ब्रिटिश रेकॉर्ड में उनको उग्रवादी और उनके संगठनों को उग्रवादी संगठन घोषित कर दिया जाता था। कांग्रेस ,हिन्दू महासभा, मुस्लिम लीग के कुछ जाहिल प्रतिष्ठित लोग अपनी शाख बचाये रखने के लिये इनके बलिदानों से  किनाराकसी कर देते थे और बड़ी आसानी से बोल देते थे वो मानसिक रूप से अहिंसक भटके हुये युवा है जो ये मानते हैं कि आज़ादी खून खराबे से मिल जायेगी। इस वजह से क्रान्ताकारी दल कुछ नाखुश था। फिर भी मैं तमाम क्रांतिकारियों का आभारी हूं जो ऐसे ओछी बातों से अपने मकसद से कभी हटे नहीं।
Hindustaan Republic Association जिसका गठन सचिन्द्र नाथ सान्याल और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे क्रांतिकारियों ने असहयोग आंदोलन के असफल हो जाने के बाद आज़ादी के मकसद से किया था। यह एक राजनैतिक पार्टी के नज़रिए से थोड़ा कम और पूरी तरह एक क्रांतिकारी संगठन था। जिसके Army chief चन्द्र शेखर आजाद थे। इस संगठन से भगत सिंह जुड़े और यह भारतीय क्रान्तिकारी इतिहास में एक क्रांति जैसी थी,अगर मैं कहना चाहूँ तो भगत सिंह का दौर क्रांतिकारी इतिहास का स्वर्ण काल था ।
 भगत सिंह एक प्रतिभाशाली, दूरदर्शी व्यक्ति थे । संगठन से जुड़ते ही उन्हें ये समझ आया की क्या फर्क है कांग्रेस और हममें की लोग कांग्रेस के पीछे पीछे चलते है। जैसा एक कहावत है जंग सिर्फ हथियारों से नहीं सिपाहियों से लड़ी और जीती जातीं है। उनको समझ आ गया कि संगठन के पास आवाम (जनता) की ताकत नहीं है। उन्होंने संगठन के मकसद और इससे नए क्रांतिकारियों को जुड़ने के अवसर देने जैसे हस्तलिखित पर्चे बाटने शुरू किये। जगह जगह घूम घूम कर अपने भाषणों और उद्देश्यों से आवाम को अपनी तरफ आकर्षित किया ।
            वो ये भी जान गए की आजादी मिलने के लिए जरूरी है कि हमारी आवाम में एकता हो। नुक्कड़ नाटकों भाषणों पर्चो से कौमी एकता जिंदाबाद का संदेश देने वाले सम्भवतः प्रथम क्रान्ति कारी थे।
 उनको ये भी समझ आया की एक दिन ये अंग्रेज़ चले जायेंगे और हिंदुस्तान की सत्ता जिसके हाथ में भी हो सामाजिक असमानता और गरीबी अशिक्षा की हालात यही होंगे। जैसा उन्होंने इस बात को ध्यान में रखकर कहा था "एक दिन ये गोरे  अंग्रेज़ चले   जायेंगे और हिंदुस्तान की सत्ता काले अंग्रेज़ो के हाथों में आ जायेगी।" (अगर आज के भारतीय स्थिति के बारे में सोचा जाए तो यह बात शत-प्रतिशत सच मालुम होती है) 
लोगो में आजादी की भावना के साथ साथ सामाजिक भावना और समानता की सोच भी पनपे इसलिए उन्होंने H.R.A. का नाम बदलकर H.S.R.A यानी HINDUSTAN SOCIALIST REPUBLIC ASSOCIATION कर दिया।
        अगर हम तेज़ दिमाग,लीडरशिप,दूरदर्शिता की बात करे तो उनको ये भी समझ आ गया कि संगठन के पास कांग्रेस जैसी अंग्रेज़ो में राजनैतिक पकड़ नहीं है। इसलिए जो भी क्रांतिकारी पकड़े जाते ज्यादातर फांसी पर चढ़ा दिए जाते है या फिर उन्हें उम्रकैद देकर जेल में सड़ते हुए मांर दिया जाता है। उनको लगा की जंग के सिपाही (क्रांतिकारी) बनाने में संगठन खून पसीना एक करती है और उनका अंत जेल की चारदीवारी में होता है। उन्होंने ये तय किया  की हम जेल के अंदर से आवाज बुलंद करेंगे। असेम्बली में बटुकेश्वर दत्त के साथ बम फोड़ना और फिर जान बूझकर पकड़े जाना उनकी दूरदर्शिता का और तेज़ दिमाग का परिचय है क्योंकि वो जानते थे की मीडिया कभी क्रान्तिकारियों की बातों को न सुनेगी और ना अखबारों में छापेगी। पर्चो से ज्यादा दूर तक प्रचार कम समय में करना असम्भव है। अगर वो पकड़े जाते है तो नामचीन क्रांतिकारी होने के नाम पर (क्योकि उनपर सांडर्स की हत्या का आरोप भी था) उनके  मुकदमे का ट्रायल हाइलाइट होगा और मीडिया इस मुकदमे की तरफ आकर्षित होगी। सांडर्स पूलिस अधिकारी था इसलिए उसकी हत्या का आरोपी जो भी अदालत में बोलेगा वो बात सिर्फ हिंदुस्तान ही नहीं लन्दन तक सुनी जायेगी और यह सबसे आसान तरीका था अपनी मकसद और अपनी सोच अपने आदर्श आम युवाओं और आवाम तक पहुंचाना।
                                                               जेल जाने का उनका मकसद ये भी था कि जेल में बंद तमाम क्रांतिकारियों की हिम्मत बड़ाई जाए और दुश्मन के गढ़ में बैठ कर अपनी साहस का परिचय दिया जाए।
जेल पहुंचते ही उन्होंने ब्रिटेन की हुकूमत तक से ये प्रस्ताव रखा की हम कोई मुजरिम नहीं है, हम क्रांतिकारी हैं हमारे साथ क्रांतिकारियों जैसा सुलूक किया जाए। हमें अंग्रेज़ कैदियों जैसा साफ़ पानी और खाना दिया जाए। पढ़ने के लिए अखबार और पुस्तके दी जाए। लिखने के लिए कॉपी और कलम दिए जाए। (ये सुविधाएं कांग्रेस के क्रांतिकारियों को बिना मांगे मिलती थी)इस मांग के लिए उन्होंने अस्थायी भूख हड़ताल की घोषणा की जो  116  दिनों  तक चला। यह पूरे विश्व मे सबसे लंबी भूख हड़ताल के नाम से अनचाहा कीर्तिमान है। आप विकिपीडिया कर सकते हैं। (इस लिंक पर क्लीक करके GANDHI AND BHAGAT SINGH वाला SUB HEADING पढ़  लीजिये  बातकी प्रमाणिकता सिद्ध हो जायेगी )
                                                          अंग्रेजी हुकूमत का आदेश था कि उनकी भूख हड़ताल को किसी भी हालत में खत्म किये जाए। इसके लिए क्रांतिकारियों  की हिम्मत तोड़ने के लिये कोड़े मारे जाते थे, बर्फ की सिल्लियों पर लिटाये जाते थे, जख्मों पर नमक रगड़ा जाटा था, हलक में लाल मिर्च डाला जाता था । जैसा की भगत सिंह अपने लेख 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' में अपनी नास्तिकता के विचार को बल देते हुए लिखा है कि वो कितना भी शारीरिक प्रताड़ना देते हों लेकिन मेरे दिमाग में किसी भी ईश्वर से रहम जैसी कोई भावना नहीं थी उनके दिमाग में एक ही बात थी इंकलाब जिंदाबाद। जैसा कहा जाता है कि जब अंग्रेज़ किसी क्रांतिकारी को मारते थे तो उसकी चीख पुरे लाहौर सेंट्रल जेल में गूँजती थी। उसकी हिम्मत बढ़ाने के लिए पूरा जेल इंकलाब जिंदाबाद ,साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के नारे लगता था। अगर आपको ये पढ़ के भी मन में कुछ भाव  उतपन्न नहीं हो रहा है तो आप इंसानों में बैल है। यह उदाहरण ही सबसे अच्छा उदाहरण है कि आज़ादी सिर्फ चरखो और नमक कानून तोड़ने से नहीं मिली। इस भूख हड़ताल में भूख से कमजोरी की वजह से जतिन दास जो भगत सिंह के करीबी थे शहीद हो गए।
                      ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने डॉक्टर से ट्रीटमेंट लेने से इसलिये मना कर दिया था कि अनशन टूट जाता और भगत सिंह से किया वादा टूट जाता। उनके अंतिम शब्द थे भगत मेरा समय आ गया है माफ़ी चाहता हूँ अंत तक साथ नहीं दे पाया,,,इंकलाब जिंदाबाद,,,साम्राज्यवाद मुर्दाबाद।।।।
                                                                           इस भूख हड़ताल और क्रांतिकारियों की हिम्मत के आगे अंग्रेज़ो को झुकना पड़ा और भगत सिंह की सारी मांगे पूरी कर ली गयी।
                                                               जब कांग्रेस आधा स्वराज्य के बात पर सहमत थी की हमें सत्ता में हिस्सेदारी चाहिए। तब भगत सिंह ही थे जिन्होंने कहा था कि हमे आजादी पूरी चाहिए और इस बात को आम जनता का भी समर्थन  मिला । इसी दबाव में 1929 के अधिवेशन में पूर्ण स्वराज की मांग की थी। 1930 जनवरी 26 को सम्भवतः पहली बार आज़ादी की घोषणा की गयी जो आधिकारिक रूप से 15 अगस्त 1947 को अंग्रेज़ो द्वारा पूर्ण रूप से की गयी।
                          ऐतोहासिक घटनाओं से पूरी तरह वाकिफ होने के लिए आप आधुनिक भारत का इतिहास पढ़ सकते हैं।

आप भगत सिंह के बारे में और भी जानने के लिये गूगल और यूट्यूब का सहारा ले सकते हैं।
क्या सीख मिलती है हमें-
1-जंग चाहे जैसा भी हो जीवन की सफलता का हो, युद्ध का हो, इश्क का हो,  बाहुबल से श्रेष्ठ बुद्धिबल है।
2- श्रेष्ठतम होने का सबसे आसान तरीका है आपकी अच्छी शिक्षा(भगत सिंह शिक्षित थे, अंग्रेजी बोलने वाले एक्के दुक्के क्रांतिकारियों में से एक थे)
3- चाहे हालात कुछ भी, आपका क्षेत्र कोई भी हो किताबे पड़ना चाहिये,इससे आपका ज्ञान बढ़ता है और दिमाग का शुद्धिकरण होता है(भगत सिंह जेल में भी समाजवाद , क्रान्ति और क्रांतिकारियों से जुडी किताबें पड़ते थे। फांसी से कुछ देर पहले भी वो लेनिन की किताब पड़ रहे थे।)
4- आप चाहे किसी भी फिल्ड में हो आपको अगर आगे बढ़ना है तो एक अच्छा वक्ता होना जरूरी है ,जो अपनी बात को अच्छे तरीके से किसी के सामने कह सके( भगत सिंह एक अच्छे वक्ता थे, इसीलिये सब उनकी सुनते थे)
5- सबसे अहम बात आपके पास तर्क करने की बुद्धि होनी चाहिए।( भगत सिंह ने  तर्क के आधार पे ईश्वर के अस्तित्व को नकारा जो आज तक अकाट्य एवं सत्य है। उन्होंने कहा कि आंग्रेज़ हम पर हुकूमत कर रहे हैं ऐसा इसलिए नहीं है कि ईश्वर ऐसा चाहता है , बल्कि ऐसा इसलिए है कि उनके पास ताकत है और उनका सामना करने के लिए हममें हिम्मत नहीं। 
5- हमे सामाजिक समानता और एकता के बारे में सोचना चाहिए। ठाकुर,पंडित ,बाभन,चमार धार्मिक असमानता जैसी जातिगत बात करने वाले लोग, भगत सिंह के विचारों के खिलाफ खड़े हैं। ऐसे लोगों की ही तादाद हिंदुस्तान में अधिक है इसलिए आज हिंदुस्तान की ये हालत है।
6-सबसे बड़ा त्याग है अपनी मकसद और सपने के लिए जो भी आदते या बाते रुकावट आये उसका त्याग कर देना। ( भगत सिंह ने अपने साथियों को लिखे अंतिम पत्र में कहा था की मुझमे भी सांसारिक मोहमाया और भौतिक सुख का आकर्षण है लेकिन मैं इन सबको किसी मकसद के लिये त्याग कर सकता हूँ । यही सच्चा त्याग है और वो मकसदे आला आजादी है)     
7- जिस मकसद के नाम आप अपना जीवन  लिख चुके है किसी भी कीमत पर उससे पीछे न हटे।( कोड़ों की मार,भूख,तमाम प्रताड़नाएं भी भगत सिंह की हिम्मत को न तोड़ सकी)
8- हर हाल में खुश रहिये( जैसा भगत सिंह ने खुद कहा है कि वो मात्र एक रोमांटिक(रोमांच से भरा हुआ) क्रांतिकारी है)।
9-आप अपने मकसद के लिए अपना अंतिम पद तक न्यौछावर कर दीजिये।

ऐसे तमाम सीख आपको भगत सिंह के जीवन से मिलेगी ,आप खुद जानिये भगत सिंह को और सीखिए।
 हिम्मती बनिये,आत्मविश्वासी बनिये,दृढ़निश्चयी बनिये, स्माजवादी मांसिकता विकसित कीजिये,अपने बच्चों को चुड़ैल या परियों की झूठी कहानियों के बजाय ऐसी प्रेरक कहानियाँ सुनाईये, नैतिक उत्थान के लिए काम कीजिये,संघर्ष कीजिये, असली शिक्षित बनिये और सबसे अहम अपने देश का इतिहास जानिये क्योकि जो पीढ़ियां अपने देश का इतिहास नहीं जानती वो कुछ नहीं कर पाती।

REVOLUTION DID NOT NECESSARILY INVOLVE SANGUINARY STRIFE.IT WAS NOT A CULT OF BOMB AND PISTOL.
                                                                     _ Bhagat Singh
                                     
                                                               BY-KASHISH








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